शहर में चर्चा है आम सुबह से, वक्त पकड़ा गया है रात,
लोगों के चहरों पे उम्र लिखते हुए,
आज पेशी है उसकी शहर मुंसिफ के यहाँ,
सोच रहा हूँ जाकर मिलूं वक्त से,
और मांगूं चाबी उन तालों की,
जो मेरे चेहरे पर दिन कि परतें चिपकाकर,
उसने लगा दिए थे दिन कि सांकल में,
काश अगर वो चाबी मुझको वक्त उधारी देदे तो,
हर एक परत का ताला खोलूं,
और उठाकर पापड़ जैसा उसे सुखादूं,
नर्म मुलायम घास के ऊपर,
आखिर पहुंचु अपने उस चेहरे तक,
जिसपर लिख्खे है तेरे नज़रों के निशाँ,
जिसकी पलकों पर लटके है,
तेरे मेरे कुछ सांझा ख़्वाब,
और होठों पे चिपका है अभी भी,
तुझसे गुफ्तगू का शहद,
और भी जाने कितने दिन,
दबे हुए है मेरे चेहरे कि इन परतों में,
सब कि चाबी मांग लाऊंगा आज वक्त से,
मगर अफ़सोस......
वक्त को दे दी है सज़ा-ऐ-मौत मुंसिफ ने,
मेरे पहुँचने से पहले,
वक्त मर रहा है हर पल,
मेरे चेहरे पे उम्र लिखकर,
वक्त के पास नहीं है वक्त
की वो चाबी का पता दे,
गुज़रे कल में वापस जाकर,
तुझको छू लूँ, तुझको जी लूँ.
मुझको ऐसा हुनर सिखा दे
Tuesday, March 30, 2010
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kya baat hai dost...lage raho ek roz waqt ki chaabi tumhare haath zaroor lagegi.
ReplyDeleteकाश ऐसा हो सकता निशांत भाई
ReplyDeleteतुम पुरानी बातों,यादों को बड़े ही खूबसूरत अंदाज़ में कागज़ पे उतारते हो| बहुत खूबसूरत लिखा है रवि
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