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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, August 29, 2010

आवारगी

ज़िन्दगी यूं भी मिली है 
कई मर्तबा सफर मे.
कि एक सांचा उछालकर 
मेरे जानिब बोली मुझसे.
गर इस सांचे मे ढल जाओगे 
दुनिया के हर ऐश-ओ-रंगीनी 
चूमेंगे कदमो को तुम्हारे,
मिजाज़-ऐ-आवारगी मेरा 
में सांचे मे बिठाता कैसे 
गर्द-ऐ-रहगुज़र का ये लुत्फ 
शीशे के मकानों मे उठाता कैसे 


                                 हर एक सांचे को ठुकरा के चला आया हूँ 
                                 मुझे फ़क्र है  में हवाओं का हमसाया हूँ