ज़िन्दगी यूं भी मिली है
कई मर्तबा सफर मे.
कि एक सांचा उछालकर
मेरे जानिब बोली मुझसे.
गर इस सांचे मे ढल जाओगे
दुनिया के हर ऐश-ओ-रंगीनी
चूमेंगे कदमो को तुम्हारे,
मिजाज़-ऐ-आवारगी मेरा
में सांचे मे बिठाता कैसे
गर्द-ऐ-रहगुज़र का ये लुत्फ
शीशे के मकानों मे उठाता कैसे
हर एक सांचे को ठुकरा के चला आया हूँ
मुझे फ़क्र है में हवाओं का हमसाया हूँ
Sunday, August 29, 2010
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