मेरे कमरे में जो बिखरे रहते हैं
बेतरतीब से पन्ने ये
इन पन्नों में दरअसल
मैं ही तो हूँ
हर रोज़ बिखरता हूँ इन वर्कों पर
मैं खुद ही अशआर बनकर
हर रोज़ जला करती है
एक उम्मीद दिए सी
शायद ......
तुम लौट के आओ इक दिन
और फिर से समेटो मुझको
शायद मैं फिर से
इक मुक़म्मल किताब हो जाऊं
Sunday, October 3, 2010
गुज़रे ग़म
वो मकाम....
वो मकाम....
जिस पे ठहर जाते है अलफ़ाज़ सभी
वो मकाम .....
जहां गुलों की रंग-ओ-बू अपनी पीठ पे लादे हुए
सफ़ेद सा धुआँ,
ज़हन के सहन में बिखरने लगता है,
वो मकाम....
जहाँ हद-ऐ-अक्ल खत्म होती है
और दिल की बस्ती में क़दम रखता हूँ मैं
वो मकाम.....
जहां कई ग़ज़लें कई नज़्में
मेरी ज़ुल्फों, मेरे होठों को छू छू के गुज़रती हैं
जब भी मिलता हूँ तुझसे
ऐ हमनशीं मेरी
मैं खुद को उस मकाम पे पाता हूँ
जिस पे ठहर जाते है अलफ़ाज़ सभी
वो मकाम .....
जहां गुलों की रंग-ओ-बू अपनी पीठ पे लादे हुए
सफ़ेद सा धुआँ,
ज़हन के सहन में बिखरने लगता है,
वो मकाम....
जहाँ हद-ऐ-अक्ल खत्म होती है
और दिल की बस्ती में क़दम रखता हूँ मैं
वो मकाम.....
जहां कई ग़ज़लें कई नज़्में
मेरी ज़ुल्फों, मेरे होठों को छू छू के गुज़रती हैं
जब भी मिलता हूँ तुझसे
ऐ हमनशीं मेरी
मैं खुद को उस मकाम पे पाता हूँ
शुक्रिया ..तुमने कभी नकारा था मुझे
कई बार सोचा है कि छोड़ दूं कोशिश ,कई बार ये ख़याल आया
कि अब हार गया हूँ शायद,
मगर वो एक लम्हा,
जिसमे तुम नकार गए थे मुझे,
ना ठहरने देता है ना बिखरने देता है,
जहां सपनों कि दीवानगी,
ना अपनों कि दुआ ही काम आई,
ज़िन्दगी से लड़ने में,
क्या बना दिया है, तुम्हारी नफरत ने
मुझको देखो ज़रा,
उठता हूँ , गिरता हूँ,
फिर लड़ता हूँ , फिर गिरता हूँ ,
ये शिददत ना बख्शी थी मुझे,
तुम्हारे प्यार ने भी,
शुक्रिया.....
तुमने कभी नकारा था मुझे....
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