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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, October 3, 2010

एक उम्मीद

मेरे कमरे में जो बिखरे रहते हैं
बेतरतीब से पन्ने ये
इन पन्नों में दरअसल
मैं ही तो हूँ
हर रोज़ बिखरता हूँ इन वर्कों पर
मैं खुद ही अशआर बनकर
हर रोज़ जला करती है
एक उम्मीद दिए सी
शायद ......
तुम लौट के आओ इक दिन
और फिर से समेटो मुझको
शायद  मैं फिर से

        इक मुक़म्मल किताब  हो जाऊं

गुज़रे ग़म

दिल के ज़ख्मों को निचोड़ा बहुत
गुज़रे ग़म खंगाला कई मर्तबा मैंने

    ना तो किसी ग़ज़ल का मजमून ही निकला
    ना पलकों पे शबनम ही दिखाई दी

दिल के ज़ख्म भी
समंदर किनारे के गढ्ढों से होते है

     वक्त की आती जाती लहरों से मिलकर   
     भरे भरे से दिखने लगते है

वो मकाम....

वो मकाम....
जिस पे ठहर जाते है अलफ़ाज़ सभी
वो मकाम .....
जहां गुलों की रंग-ओ-बू अपनी पीठ पे लादे हुए 
सफ़ेद सा धुआँ,
ज़हन के सहन में बिखरने लगता है,
वो मकाम....
जहाँ हद-ऐ-अक्ल  खत्म होती है
और दिल की बस्ती में क़दम रखता हूँ मैं 
वो मकाम.....
जहां कई ग़ज़लें कई नज़्में 
मेरी ज़ुल्फों, मेरे होठों को छू छू के गुज़रती हैं
जब भी मिलता हूँ तुझसे 
ऐ हमनशीं मेरी 
मैं खुद को उस मकाम पे पाता हूँ    
तुम भी तो कभी सुस्ता लो
तुम भी तो कभी सो जाओ
एक उम्र से बैठे हो
एक उम्र से जगते हो
ऐ रंज-ओ-गम
मेरी दहलीज़ पे तुम

शुक्रिया ..तुमने कभी नकारा था मुझे

कई बार सोचा है कि छोड़ दूं कोशिश ,
कई बार ये ख़याल आया
कि अब हार गया हूँ शायद,
मगर वो एक लम्हा,
जिसमे तुम नकार गए थे मुझे,
ना ठहरने देता है ना बिखरने देता है,
जहां सपनों कि दीवानगी,
ना अपनों कि दुआ ही काम आई,
ज़िन्दगी से लड़ने में,
क्या बना दिया है, तुम्हारी नफरत ने
मुझको देखो ज़रा,
उठता हूँ , गिरता हूँ,
फिर लड़ता हूँ , फिर गिरता हूँ ,
ये शिददत ना बख्शी थी मुझे,
तुम्हारे प्यार ने भी,

   शुक्रिया.....
                   तुमने कभी नकारा था मुझे....