वो मकाम....
जिस पे ठहर जाते है अलफ़ाज़ सभी
वो मकाम .....
जहां गुलों की रंग-ओ-बू अपनी पीठ पे लादे हुए
सफ़ेद सा धुआँ,
ज़हन के सहन में बिखरने लगता है,
वो मकाम....
जहाँ हद-ऐ-अक्ल खत्म होती है
और दिल की बस्ती में क़दम रखता हूँ मैं
वो मकाम.....
जहां कई ग़ज़लें कई नज़्में
मेरी ज़ुल्फों, मेरे होठों को छू छू के गुज़रती हैं
जब भी मिलता हूँ तुझसे
ऐ हमनशीं मेरी
मैं खुद को उस मकाम पे पाता हूँ
Sunday, October 3, 2010
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