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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, October 3, 2010

वो मकाम....

वो मकाम....
जिस पे ठहर जाते है अलफ़ाज़ सभी
वो मकाम .....
जहां गुलों की रंग-ओ-बू अपनी पीठ पे लादे हुए 
सफ़ेद सा धुआँ,
ज़हन के सहन में बिखरने लगता है,
वो मकाम....
जहाँ हद-ऐ-अक्ल  खत्म होती है
और दिल की बस्ती में क़दम रखता हूँ मैं 
वो मकाम.....
जहां कई ग़ज़लें कई नज़्में 
मेरी ज़ुल्फों, मेरे होठों को छू छू के गुज़रती हैं
जब भी मिलता हूँ तुझसे 
ऐ हमनशीं मेरी 
मैं खुद को उस मकाम पे पाता हूँ    

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