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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Friday, June 24, 2011

यादों का गुलाबजल

हमने एक शाम छुपा रख्खी है,
तेरी खुश्बू से महकी हुई,
अपनी पलकों के तहखाने में|


             दुनिया के तेज़ उजालों से, 
             जब आँखें जलने लगती हैं,


तेरी यादों के गुलाबजल में,
दो क़तरा वो शाम मिलाकर,
इन आँखों में मल लेते हैं,


             तब रूह का रेशा-रेशा, 
             और जिस्म का पोर-पोर, 
             चन्दन से,
            शीतल हो जाते हैं, 


हमने एक शाम छुपा रख्खी है .........  

Wednesday, June 22, 2011

वो कुछ इस क़दर चाहती है मुझको...

वो कुछ इस क़दर चाहती है मुझको..... 


अपने होठों से छुआकर ऊँगली,
मैं किताब के जो पन्ने पलटता हूँ,
वो उन वर्कों पर अपने होठों को रखा करती है,
और इस तरह सुर्ख हो जाती है शर्म से, 
गोया उसने चूम लिया हो मुझको ही,


वो कुछ इस क़दर चाहती है मुझको,   


ऊंची दीवारें रस्मों की, 
लांघ के मुझतक आना, 
जब नामुमकिन हो जाता है, 
तब अपने घर के कमरे में, 
वो उतने ही क़दम चलती है गिनकर, 
जितनी दूरी है,
उसके घर से मेरे घर की,
और इस एहसास से महका करती है, 
कि बस पहुँच गयी है मुझतक,
और चटक चाँदनी रात में जैसे,
मेरी बाँहों में पिघल रही है,
वो क़तरा कतरा.


वो कुछ इस क़दर चाहती है मुझको..... 


ना किसी शर्त सा है, 
ना कोई उम्मीद सा है 
उसकी तरफ से ये अनाम सा रिश्ता  
ना किसी दर्द सा है,
ना दिल के सुकून सा है, 
मेरी तरफ से ये बेनाम सा रिश्ता,
उसके होठों पे शिकवा शिकायत नहीं 
मेरे जानिब कोई,
मुझको चाहना यूँ ही ख़ामोशी से,
शाम-ओ-सहर,
गोया उसकी हो आदत कोई,
गोया उसकी हो इबादत कोई.


वो कुछ इस क़दर चाहती है मुझको.....

Monday, June 20, 2011

एक आंसू

मेरी आँखों की उँगलियों से छूटकर
मेरे गालों पे छटपटाता हुआ
जो रेत में जा मिला है
एक आँसू
वो महज़ क़तरा भर पानी नहीं
एक रिश्ता है
जो जिया था मैंने एक उम्र भर 

Sunday, June 19, 2011

बाबू जी

बाबू जी 
दुनिया की हर ऊँचाई 
उस ऊँचाई के आगे बोनी लगती हैं
जो हवा में उछालकर मुझको
आपने बख्शी थी पहली मर्तबा


साफ झलकती हैं 
मेरे नज़रिए में नज़रें आपकी 
लकीर बनके उभर आये हैं
मेरी हथेली पर 
आपकी उस ऊँगली के निशाँ
जिस ऊँगली को पकड़कर 
मैं पहली दफा खड़ा हुआ था 


नज़रों में जला करती हैं चराग़ बनकर 
अंधेरों में दुआ आपकी 
याद आती हैं बहुत मुझको 
आपसे बिछडकर झिड़कियाँ आपकी 


मेरी किस्मत में लिख दिया है 
ये परदेस किस्मत ने 
और इस परदेस में
आप बहुत याद आते हैं 
       "बाबू जी"
  

Tuesday, June 14, 2011

वो लड़की

वो लड़की पगली है दीवानी है पर अच्छी लगती है|
अनसमझी सी एक कहानी है पर अच्छी लगती है||


छत पर आकर फोन से जाने किससे लड़ती रहती है|
थोड़ी सी ज़िद्दी है मनमानी है पर अच्छी लगती है||


गर थोड़ा सा फुसला दो तो पल में बहल जाती है वो|
वो एक दम  बुद्दू  की नानी है पर अच्छी लगती है|| 


गहरी सोच में डूबे रहना और "धत्त" कहकर हंस देना|
उसकी ये आदत बड़ी पुरानी है पर अच्छी लगती है||


ना जाने क्या नाम है उसका? ना जाने कौन है वो?
वो लड़की मेरे लिए अनजानी है पर अच्छी लगती है||

Sunday, June 12, 2011

वो अजनबी चेहरे



वो अजनबी चेहरे 
तमाम
मैं वाकिफ नहीं था 
जिनके नामों से भी
कहाँ से आते थे, वो क्या करते थे.
ये भी मालूम नहीं था मुझको
बस यूँ ही रोज़ दिखा करते थे
                
 वो अजनबी चेहरे....

कभी चाय की ठेली पर,
कभी ट्रेन में,
कभी सड़क पर आते जाते. 
बरसों बीत है दिल्ली छोड़े
पर अब भी वो  याद आते हैं,
ना जाने कहां होंगे, ना जाने कैसे होंगे,
ना मालूम कि होंगे भी कि नहीं होंगे,

वो अजनबी चेहरे ............ 

वो लोग 
जो अनजाने ही बन जाते हैं 
हमसफ़र हमारे
गाहे-बगाहे 
हमारी यादों को महकाते हैं 
कभी कभी जीवन के सफर में  
किसी अपने की तरह याद आते हैं 

वो अजनबी चेहरे .......  

Friday, June 10, 2011

मेरी बिट्टो

मेरी बिट्टो
चंचल सी तुम्हारी आँखों में,
जब नन्हें ख़्वाब कुलाँचे भरते हैं,
पलकों में उलझकर ख़्वाब कई,
जब संग तुम्हारे सोते जगते हैं,
           
                        जब तुतला तुतला कर,
                        तुम मुझसे बातें करती हो,  
                        जब नन्हें होठों को तुम,
                        मेरे गालों पर रखती हो,


उस पल  
अपने सारे गम,सारे ज़ख्मों को, 
मैं पल में भुला देता हूँ,
मेरी आँखों के वो ख़्वाब कई,
जिनकी साँसे उखड रही हैं,
फिर से ज़िंदा हो जाते हैं.


                     फिर से ख्वाहिश, जीवन जीने की 
                     इस दिल में जवां हो जाती है.   

Wednesday, June 8, 2011

तवायफ



कच्चे पक्के ख़्वाब रखे हैं 
मेरे दिल की हांडी में,
कोई आकर आग जलाए तो.

ऊपर से हैं पत्थर जैसे, 
अंदर से हैं कच्ची मिट्टी हम,
कोई साँचे में बिठलाये तो.

जो भी आता है वापस मुड जाता है,
बस इस जिस्म के मीनारों से,

मैं पलक बिछाए बैठी हूँ,
दिल के चौबारे में,
कोई मुझसे मिलने आये तो"

हदें

एक पल में दूर निकल आया था, 
मैं तेरी बाहों के दायरों से.
तब ये इल्म ना था मुझको 


तेरी खुश्बू की, 
तेरी कसमों की


तेर होठों की जुम्बिश की
तेरी आँखों की शरारत की 


तेरे पलकों के शबनम की 
तेरी बातों की सरगम की   
सरहदें 
और तेरे चाहने की हदें 
इतनी दूर तक फैली होंगी 
कि इन्हें पार करते करते 


         मैं अपनी उम्र की हद पे आ गया हूँ 

एक और जलियाँवाला


आओ गायें, सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा|
कल दिल्ली में देखा हमने जलियाँवाला बाग  दुबारा||

जिस कसाब की गोलियाँ भारत का सीना छलनी कर जाती हैं,
उसकी आवभगत में सरकारें, दस करोड़ के बिल भी चुकाती हैं,
पर सत्याग्रह करने की खातिर जो माँताएं बहने दिल्ली जाती हैं,
उन सोये हुए सत्याग्रहियों पर, सरकार डंडे,आँसूगैस चलाती है.

सारे जहाँ से अच्छा .....

अमेरिका के जांबाज़ सिपाही जब  लादेन को मार गिराते हैं,
हमारे एक मंत्री जी उस दहशतगर्द के हक़ की बात उठाते हैं,
पर जब मंहगाई,भ्रष्टाचार की मारी जनता अपना दर्द सुनाती है,
तब भोली जनता की चीखों में भी उनको षड्यंत्र नज़र आते हैं. 

सारे जहां से अच्छा......

इस पर भी बात करेंगे हम बाबा पाक साफ़ हैं,योगी है या ठग हैं, 
लेकिन ये भी सोचो, उनकी माँगें क्या नाजायज़ है क्या नाहक हैं,
अपने देश का काला धन वापस आये, भ्रष्ट तंत्र से मुक्त हों हम.
ये आवाज़ उठाना नाजायज़ कैसे? ये हर हिन्दुस्तानी का हक़ है
आओ हम फिर से बनायें    सारे जहाँ से अच्छा ..... 

Saturday, June 4, 2011

मोजिज़ा (चमत्कार)

तेरी आमद से ये मोजिज़ा हो गया है 
कि सजदे को मयस्सर खुदा हो गया है


महकी हुई सी रात है तेरे तस्सवुर से 
तेरी खुश्बू से दिन इक नशा हो गया है


ये तंज़ भी अब मुझको अज़ीज़ लगते हैं 
दोस्त कहते है जब तू बावरा हो गया है 


बर्फ के टुकड़े पर हो गोया धूप की चादर
मेरी बाहों में यूँ तू क़तरा क़तरा हो गया है 


कहाँ परवाह मुझको है अब ज़माने की  
अब तू  मेरे लिए जहाँ से बड़ा हो गया है 


सदियों पुराना लफ्ज़-ऐ-इज़हार-ऐ- मुहब्बत 
होठों से तेरे फिसलकर फिर नया हो गया है   


               मोजिज़ा - चमत्कार , आमद - आना , तंज़ - कटाक्ष , गोया - जैसे,
               लफ्ज़-ऐ -इज़हार-ऐ-मुहब्बत - प्यार को बयान करने वाल शब्द
               

Friday, June 3, 2011

ज़िन्दगी तू दोस्त नहीं हो सकती

ज़िन्दगी तू बेवफा है ,
तू किसी की दोस्त नहीं हो सकती
तू हिटलर है ,तू तुग़लक है,
तू तानाशाह है बस
ज़िन्दगी तू दोस्त नहीं हो सकती

                  सूरज से मरासिम थे जिनके
                  जिनकी हमसफ़र थी चाँदनी
                  उनकी आँखें भी अब
                  क़तरा भर रौशनी की मुंतज़िर है

जिनके घर में तलाशा करती थी
ज़िन्दगी घरौंदे अपने
आज वो कहने को महज़ ज़िंदा भर हैं

                 शोहरत के मीनारों पर जिनके परचम लहराते थे
                 जिन्हें देखकर लाखों दिल धक से धड़क जाते थे

उन राजकिरण को आज ज़िन्दगी
पागलखाने ले आई है
उनके होठों पर है ख़ामोशी
आँखों में बस तन्हाई है

ज़िन्दगी तू दोस्त नहीं हो सकती
             तू हिटलर है , तू तुग़लक है,
                                     तू तानाशाह है बस

Thursday, June 2, 2011

कोशिश

कोशिश तो बस, 
कोशिश ही होती है
जाने कब नाकाफी पड़ जाये


              कोशिश, तुम्हे भुला देने की
              एक अरसे से शर्मिंदा है मुझसे,


दिन भर इस ग़फलत में रहकर 
कि भूल गया हूँ तुमको 
घर वापस आता हूँ जब 
और घर के कोने-कोने में 
तुम बिखरे मिलते हो 


              जुदा हुए यूँ तुमसे बरसों बीत गए है
              घर के आईने में लेकिन तुम छूट गए हो
              हर वो चीज़, कभी जो तुमसे वाबस्ता थी 
              चेहरा धर लेती है तुम्हारा 


तब मैं रात रात भर जाग जाग कर 
तुम्हे समेटा करता हूँ 
और ये बात ज़हन में आती है 


                 कोशिश तो बस कोशिश ही होती है 
                 जाने कब नाकाफी पड़ जाये............
           

Wednesday, June 1, 2011

प्रतिबिम्ब


मैं तुम्हारे कदमों के निशानों पर, 
अपने कदमों को जो रखकर चलता हूँ,
दरअसल,
मैं वो उम्र जी रहा हूँ
इस बहाने से,
जो मैं तब जी आया था 
जब मुझे इल्म ही न था,
बचपन की अहमियत का, 

                  तुमको लगता है, 
                  तुमको जीना सिखा रहा हूँ मैं
                  सच तो ये है तुममें,  
                  खुद को दोहरा रहा हूँ मैं   

ग़म जब पड़ जाएँ कम

अपने ग़म जब पड़ जाते है कम,
और खामोश ज़बां सी रहती है,
मेरी ये बातूनी कलम,
तब आँखों में एक जाल लगाकर
मैं अपने घर से निकलता हूँ,
चेहरे, जो मुझसे मुखातिब होते हैं
कुछ जाने कुछ अनजाने से,
उन चेहेरों पर चिपकी ग़म की स्याही को,
उन पलकों में अटके शबनम के कतरों को,
मैं अपनी आँखों में भर लेता हूँ.
दर्द के उन नगमों को, उन अश्कों को,
पहनाकर लफ़्ज़ों के कपडे फिर,
मैं पन्नों पर पिन कर देता हूँ
और एक नज़्म महकने लगती है.
अनजानी आँखों के अश्कों से भी
जब अपनी आँख भिगाकर देखोगे,
बेगानी पलकों के ख़्वाबों को भी
जब तुम जगा सुलाकर देखोगे,
             
                   तब हर चेहरे पर एक नज़्म दिखाई देगी
                   तब हर रस्ते पर एक गज़ल सुनाई देगी