अपने ग़म जब पड़ जाते है कम,
और खामोश ज़बां सी रहती है,
मेरी ये बातूनी कलम,
तब आँखों में एक जाल लगाकर
मैं अपने घर से निकलता हूँ,
चेहरे, जो मुझसे मुखातिब होते हैं
कुछ जाने कुछ अनजाने से,
उन चेहेरों पर चिपकी ग़म की स्याही को,
उन पलकों में अटके शबनम के कतरों को,
मैं अपनी आँखों में भर लेता हूँ.
दर्द के उन नगमों को, उन अश्कों को,
पहनाकर लफ़्ज़ों के कपडे फिर,
मैं पन्नों पर पिन कर देता हूँ
और एक नज़्म महकने लगती है.
अनजानी आँखों के अश्कों से भी
जब अपनी आँख भिगाकर देखोगे,
बेगानी पलकों के ख़्वाबों को भी
जब तुम जगा सुलाकर देखोगे,
तब हर चेहरे पर एक नज़्म दिखाई देगी
तब हर रस्ते पर एक गज़ल सुनाई देगी
और खामोश ज़बां सी रहती है,
मेरी ये बातूनी कलम,
तब आँखों में एक जाल लगाकर
मैं अपने घर से निकलता हूँ,
चेहरे, जो मुझसे मुखातिब होते हैं
कुछ जाने कुछ अनजाने से,
उन चेहेरों पर चिपकी ग़म की स्याही को,
उन पलकों में अटके शबनम के कतरों को,
मैं अपनी आँखों में भर लेता हूँ.
दर्द के उन नगमों को, उन अश्कों को,
पहनाकर लफ़्ज़ों के कपडे फिर,
मैं पन्नों पर पिन कर देता हूँ
और एक नज़्म महकने लगती है.
अनजानी आँखों के अश्कों से भी
जब अपनी आँख भिगाकर देखोगे,
बेगानी पलकों के ख़्वाबों को भी
जब तुम जगा सुलाकर देखोगे,
तब हर चेहरे पर एक नज़्म दिखाई देगी
तब हर रस्ते पर एक गज़ल सुनाई देगी

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