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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Wednesday, June 1, 2011

ग़म जब पड़ जाएँ कम

अपने ग़म जब पड़ जाते है कम,
और खामोश ज़बां सी रहती है,
मेरी ये बातूनी कलम,
तब आँखों में एक जाल लगाकर
मैं अपने घर से निकलता हूँ,
चेहरे, जो मुझसे मुखातिब होते हैं
कुछ जाने कुछ अनजाने से,
उन चेहेरों पर चिपकी ग़म की स्याही को,
उन पलकों में अटके शबनम के कतरों को,
मैं अपनी आँखों में भर लेता हूँ.
दर्द के उन नगमों को, उन अश्कों को,
पहनाकर लफ़्ज़ों के कपडे फिर,
मैं पन्नों पर पिन कर देता हूँ
और एक नज़्म महकने लगती है.
अनजानी आँखों के अश्कों से भी
जब अपनी आँख भिगाकर देखोगे,
बेगानी पलकों के ख़्वाबों को भी
जब तुम जगा सुलाकर देखोगे,
             
                   तब हर चेहरे पर एक नज़्म दिखाई देगी
                   तब हर रस्ते पर एक गज़ल सुनाई देगी

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