अक्सर पढ़ते पढ़ते कोई किताब
ज्यूँ मोड़ दिया करते हैं
कुछ पन्नों के कोने हम
फिर पढ़ने की ख्व़ाहिश में,
ज्यूँ मोड़ दिया करते हैं
कुछ पन्नों के कोने हम
फिर पढ़ने की ख्व़ाहिश में,
बिलकुल वैसे ही मोड़े थे हमने तुमने
कुछ नर्म मुलायम लम्हों के कोने
फिर जीने की चाहत में
कुछ नर्म मुलायम लम्हों के कोने
फिर जीने की चाहत में
मुड़े हुए इन लम्हों के मोड़ों पर
कुछ इस तरह से ठहर गयी है ज़िन्दगी
कि वक़्त भले ही मीलों दूर निकल आया है
पर उन लम्हों के मुड़े हुए कोनों से
मैं रत्ती भर भी आगे बढ़ा नहीं हूँ ...
कुछ इस तरह से ठहर गयी है ज़िन्दगी
कि वक़्त भले ही मीलों दूर निकल आया है
पर उन लम्हों के मुड़े हुए कोनों से
मैं रत्ती भर भी आगे बढ़ा नहीं हूँ ...

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