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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Tuesday, May 31, 2011

वो अच्छा लगता है

बातों का जादूगर है वो जादू वाले बांण चला देता है,
                                                    वो अच्छा लगता है 
झूठे ही सही पर अपनेपन एहसास करा देता है,
                                                    वो अच्छा लगता है 


जूझ रही है सारी दुनिया कल के गुणा भाग से जबकि 
इतना काफी है मेरी खातिर,वो मेरा आज सजा देता है 
                                                  वो अच्छा लगता है


काला जादू है या क्या है , उसकी उन दो आँखों में
धोखा भी देता है तो ऐसे, कि एहसान चढा देता है 
                                           वो अच्छा लगता है

ये हद-ऐ- मुहब्बत है मेरी या हुनर उसकी गुफ्तगू का है 
मेरे सूरज भी जुगनू लगते हैं, जो वो चराग जला देता है 
                                                    वो अच्छा लगता है 


वो मुश्किल भी जो, हर मुश्किल से बड़ी लगती है मुझको 
एक पल में हवा हो जाती है, जो मुझे सीने से लगा लेता है 
                                                       वो अच्छा लगता है 


चर्चा है शहर भर में कि वो बदनाम सी एक शै है महज़ 
मुझको तो दिखाई लेकिन, उसकी आँखों में खुदा देता है 
                                                    वो अच्छा लगता है  
  
  
                                                   

Sunday, May 29, 2011

तुम होते तो अच्छा होता

देखो बादल फिर आये हैं, तुम होते तो अच्छा होता 
पलकों में शबनम के साये है,तुम होते तो अच्छा होता 


छोड़ दिया करते थे हम तुम जितनी खुशियाँ खुरचन में 
आज मांगने उतनी खुशियाँ  हम मंदिर तक आये हैं 
               
                                 तुम होते तो अच्छा होता .........


झूठ मूठ का हँसते हँसते दिन भर पलकें दुःख जाती हैं 
रात ढले तक फूट फूट कर, रोने का दिल करता है 


                                 तुम होते तो अच्छा होता ..........


जीवन भर साथ निभाने का तुम वादा तोड़ गए थे एक दिन 
तुम से बिछडकर मर जाने का हम हर दिन वादा तोड़ रहे हैं 


                                तुम होते तो अच्छा होता .............


फिर नहीं लौटकर आते हैं, जाने वाले हमने माना लेकिन
दहलीज़ पे अटकी रहतीं हैं, ये दो सूनी आँखें फिर भी 


                                तुम होते तो अच्छा होता ..............

Tuesday, May 17, 2011

पिछला मौसम


कल मौसम की पहली बारिश थी 
कुछ सोचकर नहीं भीगी मैं ...
बादल अपनी ज़ुल्फों को झटक झटक कर,
बिलकुल वैसे ही बरस रहे थे 
जैसे बरसे थे पिछले मौसम में 
जब हम तुम दोनों भीग रहे थे
एक दूजे की बाँहों में,
हवा जोर का धक्का देकर
जब बूंदों को दौडाती थी
अंदर तक आ जाती थी बूंदे मेरी खिड़की से
मैं हाथों से ढक लेती थी झट अपना चेहरा,
बूढ़ी सी बूँद अगर कोई, जो भिगो चुकी हो
हम दोनों को पिछले मौसम में
मुझसे से पूछे
"तुम तन्हा क्यों हो
क्यों संग नहीं है वो पिछले मौसम का साथी
तो क्या बोलूँगीं में

       कल मौसम की पहली बारिश थी
                  कुछ सोचकर नहीं भीगी मैं .......... 

Thursday, May 12, 2011

अजनबी सी ज़िन्दगी

ज़िन्दगी 
रूठी हुई कोई प्रेमिका सी होती तू 
तो मना भी लेता तुझको
रूठी हुई प्रेमिका अपनी सी तो लगती है 
मुझे मालूम तो रहता है 
क्या कहके हंसा दूंगा उसको 
क्या कहके मना लूँगा उसको 
तू जो रूठे 
तो तेरे छोर पकडना मुश्किल हो जाता है
तू जो रूठे 
तो तेरे उलझे हुए से धागों को 
फिर से बुनना मुश्किल हो जाता है 
तू जो रूठे तो बखुदा 
बड़ी अजनबी सी लगती है