एक रात निचोड़ी थी हमने,
रात के दोनों छोर पकड़कर,
एक चाँद जलाया था हमने,
सर्द हवाओं में,
अपनी साँसों कि गर्मी से,
और महसूस किया था शब भर,
हमने शबनम कि तपिश को,
फिर बैरन सुबह ने आकर,
उस रात पे पानी डाल दिया था,
कितने रोज़-ओ-शब,
तब से दफनाए हैं मैंने,
अधजली वो रात मगर,
हर रात में जल उठती है,
रह रह कर,
दो दो रातें एक रात में,
मजबूरन जीती हूँ मैं,
जिस रस्ते पर तुमको,
जाते देखा था मैंने,
लिखती रहती हूँ मैं,
अपनी नम आँखें उसपर,
कभी वक्त मिले तो आकर,
वो एक रात बुझा जाना ......
Sunday, April 11, 2010
Thursday, April 1, 2010
सच्चाईयाँ
हर कोई झेलता है यहाँ खुद अपनी तन्हाइयां
अंधेरों में छोड़ती है साथ खुद कि परछाइयां
वादा तो कर गया है वो तूफां में साथ देने का
उसने देखी नही अभी समंदर कि गहराइयां
हमने जाना ये राज़ महफ़िलों कि रौनकों में
तन्हाइयों से हैं नुकीली महफ़िलीं तनहाईयाँ
चांदनी रातों में पिघलें आपकी बांहों में हम
रोज़ मरती हैं ऐसे तसव्वुरात कि अंगडाइयां
अंधेरों में छोड़ती है साथ खुद कि परछाइयां
वादा तो कर गया है वो तूफां में साथ देने का
उसने देखी नही अभी समंदर कि गहराइयां
हमने जाना ये राज़ महफ़िलों कि रौनकों में
तन्हाइयों से हैं नुकीली महफ़िलीं तनहाईयाँ
चांदनी रातों में पिघलें आपकी बांहों में हम
रोज़ मरती हैं ऐसे तसव्वुरात कि अंगडाइयां
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