धूप का जाने क्या रिश्ता है
उन ऊंची पहाड़ी के पेड़ों से
सुबह सवेरे सबसे पहले
उनकी ज़ुल्फें चूमा करती है
जाने क्या क्या बातें करती हैं
लिपट लिपट कर उन पेड़ों से
नीचे उतरा करती है
धूप का जाने क्या रिश्ता है
शाम ढले जब आवाज़ें देता है सूरज
"अपनी चादर तुरत समेटो
और चलो संग मेरे अब तुम "
बूढ़ी धूप उन्ही पेड़ों को पकड़कर
सूरज तक का रस्ता तय करती है
पूरे दिन का लेखा-जोखा
उन पेड़ों को समझाकर
फिर आने का वादा करके
फिर उस पार उतरती है
धूप का जाने क्या रिश्ता है
Tuesday, December 28, 2010
Monday, December 27, 2010
एक अहसास
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