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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Tuesday, September 24, 2013

हौसला


खुद पे इतरा न यूँ, ज़िन्दगी
मेरे होठों पे देखकर
मुस्कुराहट के काफिले
तेरी सलाहियतों का नहीं
ये मेरे हौसले का जलवा है
कि मुस्कुरा रहा हूँ मुसलसल
मैं तेरे ग़म को दरकिनार करके

Saturday, September 21, 2013

ज़िन्दगी


तुमसे मिले थे जो दर्द-ओ-सुकूं मुझको
तुम्हारे संग जिए थे जो एहसास मैंने
उन्ही एहसासात को अल्फ़ाज में
मैं पिघला रहा हूँ अब तक
नज़्मों की शक्ल उन्ही जज़्बात को
मैं पहना रहा हूँ अब तक
तुम थीं तो तुम्ही,
जीने का एक सहारा थीं
तुम्हारे बाद भी
ये नज़्में बेचकर
तुम्ही से ज़िन्दगी
चला रहा हूँ अब तक

मैं


ये दौलतें ये शौहरतें
ये ज़िन्दगी के सिलसिले हसीन
मंजिलें तू छीन या
छीन ले तू राहों की ज़मीन
मुझसे मेरी "मैं" न छीन

मेरी दोस्त प्याज


तुम्हारे बदन की गोलाई
वो मेरा उँगलियों से नापना
तुम्हारी आमद से हो जाना
वो मेरे घर का खुशबू खुशबू
तुम्हे यूँ ही ताकते रहना वो मेरा अपलक
मेरे होठों पे हावी वो तुम्हे पा लेने की ललक
जिस्म से होते हुए वो तुम्हारा रूह तक जाना
सुबह शाम, हमारा इसी किस्से को दोहराना
तुम्हे देखते ही वो मेरी आँखों में समन्दर
तुम्हारे होने की ख़ुशी से वजूद मेरा तर-ब-तर
अब वो गुज़रे जन्मों की बात लगती है
बिछड़े हुए सपनो की बात लगती है
कभी वक़्त मिले तो घर लौट का आना
मैं तुमसे बिछड़कर उदास बहुत हूँ

ए मेरी दोस्त प्याज

ॐ जय प्याज हरे

ॐ जय प्याज हरे मैया जय जय प्याज हरे|
रंक हो या हो राजा सब तुम्हरे चरण पड़े||

जिस के भी द्वार तुम्हारे पावन चरण पड़े| मैया...
आस पड़ोस में उसका मान सम्मान बढे || ॐ जय ...

जयकारा छिलके वाली का

"जिनके दर पे झुकती थी दुनिया वो सर झुकाए बैठे हैं
कुर्सी बचाने की खातिर दरबार में हाजरी लगाये बैठे हैं
तुम्हारी महिमा का जलवा ये है ये ए मेरी प्याज माँ
दिल्ली के C.M, PM. तुम्हारी दुकान लगाये बैठे हैं"

प्रेमी युगल ये सोचें उनका यूँ प्यार बढे| मैया .
जैसे रेट तुम्हारा दिन और रात बढे ||

जिसके घर में तुम्हारी खपत ज़रा सी बढे| मैया
इनकम टेक्स का छापा उसके घर में पड़े ॐ

प्याज मैया जी की आरती जो कोई नर गावे| मैया
उसकी रसोई में हर दिन प्याज नज़र आवे || ॐ

Saturday, September 7, 2013

मुसलसल इंतज़ार


एक पलड़े में
कुछ बुझे बुझे से चाँद
कुछ, अंधेरों में डूबे हुए सूरज
रास्ते को पथराई आँखों से
तकती मेरी दहलीज़
और कभी ना ख़तम होने वाला इंतज़ार
ज़िन्दगी की रोज़मर्रा की ज़रूर्यियात
अपनों के मशविरे और
गैरों के तंज़ की बरसात

दुसरे पलड़े में मुझमें बिखरे हुए तुम
और मुझको को बांहों में समेटती
तुम्हारी मखमली याद

इन दोनों पलड़ों के संतुलन में
कभी पूरी तरह हताश,
कभी आगे बढ़ जाने की
पलकों पर बाले हुए आस
कभी खुद से भागता सा
कभी साँसों की लम्बाई
बिलान्दो से नापता सा
मैं

तुमसे बिछड़कर यूँ
मिला करती है अब
मुझसे हर रोज़ ज़िन्दगी

Tuesday, September 3, 2013

नाराजगी


जो भी करते हो गर तुम ही करते हो
अच्छा बुरा है जो सब तुम रचते हो
तो उत्तर दो हे इश्वर मैं किताबों से दूर क्यूँ हूँ
अपने जायज़ सपने भी पाने में मजबूर क्यूँ हूँ

गर नहीं तुम्हारी कुव्वत थी
मुझे रोटी कपड़ा देने की
क्यूँ सोचा फिर तुमने
बच्चे को दुनिया में भेज दूं
तुमने छीना बचपन मेरा
मैं इतना गुस्सा हूँ तुमसे
सोच रहा हूँ बीच चौराहे
तुमको औने पौने में बेच दूं

खामोशियाँ

न उसने कुछ कहा न मैंने ही कुछ कहा
बस तैरती रही एक खामोशी दरमियाँ
न मालूम कि कर पायी तर्जुमा
किस हद तक वो मेरी खामोशी का
ना मालूम समझ पाया कितना
मैं उसकी खामोशी के मानी
बस इतना ही समझ पाए दोनों
कि ये वक़्त-ए-जुदाई है
मुस्कुराके गले मिले
हम एक दुसरे से
और उम्र भर को जुदा हो गए

Sunday, September 1, 2013


मेरे अनुत्तरित प्रश्नों से रंगा मेरा मन दर्पण
तुम्हारा दीर्घ मौन, मौन की तीखी चुभन
और हमारा रिश्ता

सपनों के अम्बर पर मेरा मन हिरन
बंदिशों, दायरों का घर तुम्हारा जीवन
और हमारा रिश्ता

मेरे मन में कुलांचे भरते आवारगी,फ़कीरपन
बांहों में समेटने को दुनिया,आतुर तुम्हारा मन
और हमारा रिश्ता

अभावों के मंच पर, मेरी संतुष्टि के गीत की सरगम
“और कुछ” की चाह में तुम्हारे दामन का ये खालीपन
और हमारा रिश्ता

तुम्हे पाने के एवज़ में मेरा इश्वर को नमन वंदन
मुस्कुराहटें दरकिनार करके हर पल तुम्हारा क्रन्दन
और हमारा रिश्ता

प्रेम के पथ पर अपना सर्वस्व लुटाता एक जीवन
खोने पाने के गणित में उलझा एक व्यापारीपन
और हमारा रिश्ता

संग चलने की ख्वाहिशें, ना मिल पाने का बंधन
दो किनारों से फासले मगर दरिया सा सांझापन
और हमारा रिश्ता