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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Saturday, July 10, 2010

ग़म

ऐसे भी कई ग़मों से,
मैं दहशत में रहा रोज़-ओ-शब,
जो ज़िन्दगी में थे ही नहीं,
बस उनके आने का अंदेशा भर था,
ग़म तेरी ताकत से मैं मुत्तासिर हूँ बहुत,
अपने होने का अहसास करा सकता है
अपनी आमद से बहुत पहले तू,
सुख तो है कोई कायर जैसा,
ग़म के आने की आहट से ही
सुख के सभी बुलंद घरोंदे
ढह जाते है इक लम्हे में,
लेकिन मर्द बड़ा है ग़म का बच्चा
ग़म का एक कतरा काफी है
सुख से भरे समंदर को
रेगज़ार करने के लिए ....

                                                                     रोज़-ओ-शब = दिन रात
                                                                     मुत्तासिर = प्रभावित
                                                                     रेगज़ार = रेगिस्तान

पप्पी


पप्पी..
मैं इस मुग़ालते में था
कि मैं भूल गया हूँ तुमको,
और शहर बदलकर मैंने
रिश्तों का चेहरा भी बदल लिया है,
अब वो रिश्ता नहीं बाक़ी
मेरे तुम्हारे दरमियाँ,
जिसका एक नाम था कभी,
तुम मुझको दादा कहते थे
और में तुम्हे प्यार से "पप्पी"
फिर तुमने शराब से मिरासिमदारी करली,
और बाक़ी सारे रिश्ते एक बोतल से हार गए,
तबसे अबतक मैंने तुमसे नफरत की है,
पर आज अचानक खबर ये सुनकर,
कि तुम दुनिया से चले गए हो,
परदेस में बैठा रोता हूँ मैं
अपने कमरे का कैदी होकर,
तुम तो जा ही चुके हो,
काश तुम्हारे जिस्म को छूकर
तुम से मिल पाता आखरी मर्तबा,
पर वक्त की अपनी मजबूरी है,
जीने की शर्तें ज़रूरी हैं,
अब जबकि आखरी सफर पे
तुम्हे निकाल रहे होंगे लोग,
वक्त-ऐ-रुख़सत दुनिया से
तुम मुझमे से भी निकल रहे हो,
ये आंसू बन कर,
मुझको इल्म नहीं था पप्पी,
तुम मुझमे इतने बाक़ी हो,
मुझको इल्म नहीं है पप्पी,
तुम मुझमे कितने बाक़ी रह जाओगे.

Saturday, July 3, 2010

वो खिड़की उदास रहती है

वो खिड़की,
जो मेरी खिड़की से दिखती है ,
जिसमे अक्सर तुम दिखते थे ,

अब वो खिड़की उदास रहती है,

ना जाने कब सोती है,
ना जाने कब जगती है,

एक अरसे के बाद यूं ही ,
उस खिड़की पर नज़र पड़ी ,
तो याद आया मुझे,
कभी मामूल में था शामिल ,
सुबह उठना वो खिड़की तकना ,
जब भी अपनी खिड़की पर आना ,
उस खिड़की से आँख मिलाना ,
करती रहती थीं बातें ,
दोनों खिड़की जाने क्या क्या ,

जब से निकल गए हो तुम ,
उस खिड़की की बांहों से ,
वो ख़ामोशी का ओढ़े लिबास रहती है ,

अब वो खिड़की उदास रहती है .