वो खिड़की,
जो मेरी खिड़की से दिखती है ,
जिसमे अक्सर तुम दिखते थे ,
अब वो खिड़की उदास रहती है,
ना जाने कब सोती है,
ना जाने कब जगती है,
एक अरसे के बाद यूं ही ,
उस खिड़की पर नज़र पड़ी ,
तो याद आया मुझे,
कभी मामूल में था शामिल ,
सुबह उठना वो खिड़की तकना ,
जब भी अपनी खिड़की पर आना ,
उस खिड़की से आँख मिलाना ,
करती रहती थीं बातें ,
दोनों खिड़की जाने क्या क्या ,
जब से निकल गए हो तुम ,
उस खिड़की की बांहों से ,
वो ख़ामोशी का ओढ़े लिबास रहती है ,
अब वो खिड़की उदास रहती है .
Saturday, July 3, 2010
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क्या बात है ...बहुत सही बंधू |
ReplyDeleteबहुत अच्छी प्रस्तुति।
ReplyDeleteइसे ०४.0७.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://charchamanch.blogspot.com/
बहुत सुंदर प्रस्तुति...!!
ReplyDeleteआप सभी का आभार
ReplyDeleteबहुत खूब !!!!!
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