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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, August 25, 2013

दुकानें


राजभवन में राम के हुआ अचानक हल्ला
सावधान ए वीरो हो सकता है राम पे हमला
क्रोध में भरकर बोले लक्ष्मण जो भ्राता पर कुद्रष्टि डालेगा
है शपथ राम की ये दास राम का,उसका नाम मिटा डालेगा
मंद मंद मुस्काकर बोले भगवन अनुज शांत हो जाओ तुम
गौर से सारे खेल को समझो और सबको समझाओ तुम

हाथों में जो फूल लिए है मुझको अर्पित करने आया है
और उसके रस्ते में जिसने साइकिल का जाल बिछाया है
अपने अपने खेल के देखो, दोनों मंझे खिलाड़ी हैं
दोनों एक दूजे के पूरक हैं, दोनों पक्के वाले याड़ी हैं
हाथ ये हर पल सोच रहा है कैसे फिर खेल का हिस्सा हो जाऊं मैं
हाथी भी है घात लगाये, किसको कुचलूँ किसको सर पे बिठाऊं मैं

निश्चिन्त रहो हे लक्ष्मण बिलकुल नहीं तुम्हारा राम खतरे में
वो भी खुदा को बेच रहे हैं, जो चीख रहे कि है इस्लाम खतरे में
बस उलझा दिया है आम आदमी , विकास का ताकी ज़िक्र न हो
पड़ जाएगी वर्ना इन सबकी आपनी अपनी दुकान खतरे में

लक्ष्मण क्या मुझे सुरक्षा देगा कोई,क्या मुझे हानी पहुंचाएगा
जिस दिन हल्का सा भी चाह लूँगा सब मिटटी में मिल जायेगा

Friday, August 23, 2013

गुलज़ार साब के लिए

ना मालूम हिमाक़त है कि हिम्मत है
यूँ दस्तक देना सूरज के दरवाज़े पर
मुझ अधजले से दीपक की

मैं ये सोच कर आपके सजदे में हूँ
आप मुस्कुरा जो दिए तो संवर जाऊंगा
गर न हो सकी हासिल मुझको
नज़र-ए-करम आपकी
तब भी उम्र भर
मैं अपने हौसले पे मुस्कुराऊंगा

शिकवा

मैं तेरी ही सूरत तलाशता हूँ 
खंडहर से भी मंदिर में
मैं सज्दा करके ही बढ़ता हूँ आगे 

बंद मस्जिद को भी तेरी
तू गुज़र पाता है कैसे 

ए खुदा
मेरे ज़िंदा ख़्वाबों की आँखें मीचकर

Wednesday, August 21, 2013

मलाल

जिस तरह किसी ने रेत पे हर्फ़ लिखकर मिटाया हो
उस तरह जिस शख्श ने मुझे चाहा और भुलाया हो

वो अब भी इस तरह से क्यूँ है शामिल मुझमें
कि हर किसी को मुझमें वो नज़र आता है अब भी
मैं किसी देश, किसी शहर ,किसी राह चला जाऊं
वो मेरी बाजू से गुज़र जाता है अब अभी
अक्स नज़र आता है उसी का मेरे अंदाज़-ओ-तास्सुरात में
ज़िक्र आता है उसका खुद-ब-खुद मेरी कही हर बात में

जाने क्यूँ उसको रस्म-ए-मुहब्बत निभाना नहीं आया
जाने क्यूँ मुझे उसको याद करके भुलाना नहीं आया

रक्षाबंधन

ऊंघती खामोश रात में कुछ दाढ़ीयों से नज़रें बचाकर
मस्जिद ने मंदिर की तरफ देखा और फुसफुसाई
कैसे हो भैया
सोये हुए त्रिशूलों की तरफ देखकर मंदिर अहिस्ता से बोला
कैसे कह दूं बहन की सब कुछ ठीक है

क्या थे और क्या हो गएँ हैं हम तुम
अपने जिन बच्चों को हमने वसुधैव कुटम्बकम सिखलाया था
आरतियों,अजानों में जिनको अमन-ओ-चैन का पाठ पढाया था
कैसे उन्ही अपनों के हाथों के हम खिलौने हो गए
प्रेम गीत गाते गाते नफरत के बिछौने हो गए

नम आँखों से कुछ कराहती सी बोली मस्जिद
जिनको सिखाया था हमने इंसान होना
उन्ही ने हमको राजनीति का मोहरा बना डाला
अपने स्वार्थों की खातिर
कभी हमको बना डाला कभी हमको मिटा डाला

कांपते हाथों से फिर मस्जिद ने राखी बाँधी मंदिर की कलाई पर
सुबक सुबक के रोया मंदिर काबू न रहा उसको रुलाई पर
तभी कुछ आहट सी हुई और दोनों चौकन्ने से हो हो गए
रक्षाबंधन के दिन भी दो भाई बहन फिर दुश्मन से हो गए

Sunday, August 18, 2013

शहीद


ताबूत में इत्मीनान से सोया एक शहीद का शव
अचानक मुस्कुरा उठा दिल्ली की ये बात सुनकर
कि "क़ुरबानी ज़ाया न जाएगी, हम शहीदों के साथ हैं"

उसकी गीली सी आँखों में उभर आई
फिर एक कडवी सी सच्चाई
कि आने वाले कल में वो फाइलों के बोझ तले दोबारा दम तोड़ रहा है
अपने हक की खातिर उसका बूढा पिता दफ्तर दफ्तर दौड़ रहा है

फिर उसने टीवी पर सफेदपोशों के नाटक और आंसूं घडयाली देखे
अपने शव पर बिसात बिछाते राजनीति के कुशल खिलाडी देखे

वो धीरे से बुदबुदाया मेरी कुर्बानी ज़ाया न जाएगी
देश के आये न आये नेताओं के ज़रूर काम आयेगी
उसने दर्द से कराह कर अपनी आँखें बंद करली
और अपनी महायात्रा पर निकल गया.....


हौसला


ज़िन्दगी के सफ़र में, जो तेरे पाँव में छाले पड़े हैं
मुश्किलात के बवंडर, जो तेरी राहों में अड़कर खड़े हैं
तेरी पलकों पे जो अश्कों की नमी सी है
तेरी ज़िन्दगी में जो खालीपन है, कमी सी है

तू अपनी राह से डांवाडोल न होना
यकीनन ज़िन्दगी एक दिन तेरे सजदे में उतर जाएगी
वक़्त की बेरहमी से तू मायूस न होना
ये जो अँधेरी रात है अब जल्द सिमट जाएगी

तेरी आँखों में अगर ख़्वाबों का डेरा होगा
जिसे भी चाह लेगा तू वो यकीनन तेरा होगा


happy b.day gulzaar saab


तब और भी चमकीले लगते हैं, आपकी मुठ्ठी के चाँद सूरज
कुछ और भी बुलंद दिखती हैं आपके क़दमों तलें की बुलंदियां
जब बीत गयी हों सदियाँ कई, महज़ एक चिराग जलाने में
जब खर्च हो गयी हो साबुत उम्र, नाकुछ सा मकाम पाने में

नेता यूनियन जिंदाबाद


हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, सारे नेता भाई भाई
एक ही सुर में बोले सारे, जब गले पड़ी आर.टी.आई

कैसा सुन्दर दृश्य बना था, कैसी बेला थी मनभावन
जब त्रिशूल से मिलकर, तलवार ने छेड़ी थी सरगम
जात पात और धर्म मज़हब, सब के बंधन टूट गए
गैर मराठी और मराठी, ये मसले भी पीछे छूट गए

जब नेताओं ने प्रेम की बारिश एक दूजे पर बरसाई
एक ही सुर में....

दोगले नेता, जो जनता की सेवा का ढोंग रचाते है
सरकारी खर्चे पर जो देश विदेश की मौज उड़ाते हैं
हम नहीं "संस्था सरकारी" हम "स्वैच्छिक दल" हैं
जवाबदेही के नाम पे देखो, ये कहकर बच जाते हैं

इनके रंग बदलने पर गिरगिट की माँ भी शरमाई
एक ही सुर में ....

जब देश गर्त में जाता है जब आम आदमी चिल्लाता है
काश कि यही एकता तब इन लोगों ने दिखलाई होती
वो उलझे सुलझे मसले जो भारत की रूह में चुभते हैं
उनको सुलझाने में तत्परता यूँ ही दिखलाई होती

तो देश में बहती हर कोने से खुशहाली की पुरवाई
एक ही सुर में.......


लेप


चढ़ा लिया है अपनी रूह पर मैंने
इस तरह तेरे एहसासों का लेप
कि अब छू भी नहीं पातीं मुझको
जलती हवाएं, तपती दोपहरियाँ

कल, आज और कल

सदियों पहले की बात है कि
एक दफा गुस्से से फूलकर
धरती पर आ गिरा था वक़्त
अपनी माँ की गोद से कूदकर
और बंट गया था तीन टुकड़ों में वजूद उसका
कल, आज और कल

वो हिस्सा जो ज़ख़्मी होकर नीचे की तरफ लुढ़क गया था
गुज़रा कल कहलाया
वो हिस्सा जो उचक के ऊंचे पेड़ पे जा बैठा
आने वाला कल है
इन दोनों के हाथ को पकडे घिसट रहा है तीसरा भाई "आज"

फिर एक हों जाएँ तीनो इसी कवायद में
"आज " कभी गुज़रे कल की तरफ दौड़ता है
उसको देकर सहारा अपने घर में ला बिठाता है
और उसके ज़ख्मों पर मरहम लगता है
 

कभी पंजों के बल खड़े होकर
करता है कोशिश चूमने की आने वाले कल को
एक कदम ऊंचा हो जाता है "आज"
रोज़ उस पेड़ की टहनी पकड़कर
हर रोज़ मगर आने वाला कल
ऊपर चढ़ता जाता है पेड़ की फुलंग पर
और पीछे छूटता जाता है हर रोज़ गुज़रा हुआ कल

इन्ही दोनों कलों की हसरत लिए
सदियों से खुद से बेखबर
ये "आज" चल रहा है मुसलसल
हम तीनो शायद एक हों जायें कभी
फिर लौट के माँ के घर जाएँ कभी