हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, सारे नेता भाई भाई
एक ही सुर में बोले सारे, जब गले पड़ी आर.टी.आई
कैसा सुन्दर दृश्य बना था, कैसी बेला थी मनभावन
जब त्रिशूल से मिलकर, तलवार ने छेड़ी थी सरगम
जात पात और धर्म मज़हब, सब के बंधन टूट गए
गैर मराठी और मराठी, ये मसले भी पीछे छूट गए
जब नेताओं ने प्रेम की बारिश एक दूजे पर बरसाई
एक ही सुर में....
दोगले नेता, जो जनता की सेवा का ढोंग रचाते है
सरकारी खर्चे पर जो देश विदेश की मौज उड़ाते हैं
हम नहीं "संस्था सरकारी" हम "स्वैच्छिक दल" हैं
जवाबदेही के नाम पे देखो, ये कहकर बच जाते हैं
इनके रंग बदलने पर गिरगिट की माँ भी शरमाई
एक ही सुर में ....
जब देश गर्त में जाता है जब आम आदमी चिल्लाता है
काश कि यही एकता तब इन लोगों ने दिखलाई होती
वो उलझे सुलझे मसले जो भारत की रूह में चुभते हैं
उनको सुलझाने में तत्परता यूँ ही दिखलाई होती
तो देश में बहती हर कोने से खुशहाली की पुरवाई
एक ही सुर में.......

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