ताबूत में इत्मीनान से सोया एक शहीद का शव
अचानक मुस्कुरा उठा दिल्ली की ये बात सुनकर
कि "क़ुरबानी ज़ाया न जाएगी, हम शहीदों के साथ हैं"
उसकी गीली सी आँखों में उभर आई
फिर एक कडवी सी सच्चाई
कि आने वाले कल में वो फाइलों के बोझ तले दोबारा दम तोड़ रहा है
अपने हक की खातिर उसका बूढा पिता दफ्तर दफ्तर दौड़ रहा है
फिर उसने टीवी पर सफेदपोशों के नाटक और आंसूं घडयाली देखे
अपने शव पर बिसात बिछाते राजनीति के कुशल खिलाडी देखे
वो धीरे से बुदबुदाया मेरी कुर्बानी ज़ाया न जाएगी
देश के आये न आये नेताओं के ज़रूर काम आयेगी
उसने दर्द से कराह कर अपनी आँखें बंद करली
और अपनी महायात्रा पर निकल गया.....

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