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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, August 18, 2013

शहीद


ताबूत में इत्मीनान से सोया एक शहीद का शव
अचानक मुस्कुरा उठा दिल्ली की ये बात सुनकर
कि "क़ुरबानी ज़ाया न जाएगी, हम शहीदों के साथ हैं"

उसकी गीली सी आँखों में उभर आई
फिर एक कडवी सी सच्चाई
कि आने वाले कल में वो फाइलों के बोझ तले दोबारा दम तोड़ रहा है
अपने हक की खातिर उसका बूढा पिता दफ्तर दफ्तर दौड़ रहा है

फिर उसने टीवी पर सफेदपोशों के नाटक और आंसूं घडयाली देखे
अपने शव पर बिसात बिछाते राजनीति के कुशल खिलाडी देखे

वो धीरे से बुदबुदाया मेरी कुर्बानी ज़ाया न जाएगी
देश के आये न आये नेताओं के ज़रूर काम आयेगी
उसने दर्द से कराह कर अपनी आँखें बंद करली
और अपनी महायात्रा पर निकल गया.....


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