सदियों पहले की बात है कि
एक दफा गुस्से से फूलकर
धरती पर आ गिरा था वक़्त
अपनी माँ की गोद से कूदकर
और बंट गया था तीन टुकड़ों में वजूद उसका
कल, आज और कल
वो हिस्सा जो ज़ख़्मी होकर नीचे की तरफ लुढ़क गया था
गुज़रा कल कहलाया
वो हिस्सा जो उचक के ऊंचे पेड़ पे जा बैठा
आने वाला कल है
इन दोनों के हाथ को पकडे घिसट रहा है तीसरा भाई "आज"
फिर एक हों जाएँ तीनो इसी कवायद में
"आज " कभी गुज़रे कल की तरफ दौड़ता है
उसको देकर सहारा अपने घर में ला बिठाता है
और उसके ज़ख्मों पर मरहम लगता है
कभी पंजों के बल खड़े होकर
करता है कोशिश चूमने की आने वाले कल को
एक कदम ऊंचा हो जाता है "आज"
रोज़ उस पेड़ की टहनी पकड़कर
हर रोज़ मगर आने वाला कल
ऊपर चढ़ता जाता है पेड़ की फुलंग पर
और पीछे छूटता जाता है हर रोज़ गुज़रा हुआ कल
इन्ही दोनों कलों की हसरत लिए
सदियों से खुद से बेखबर
ये "आज" चल रहा है मुसलसल
हम तीनो शायद एक हों जायें कभी
फिर लौट के माँ के घर जाएँ कभी
एक दफा गुस्से से फूलकर
धरती पर आ गिरा था वक़्त
अपनी माँ की गोद से कूदकर
और बंट गया था तीन टुकड़ों में वजूद उसका
कल, आज और कल
वो हिस्सा जो ज़ख़्मी होकर नीचे की तरफ लुढ़क गया था
गुज़रा कल कहलाया
वो हिस्सा जो उचक के ऊंचे पेड़ पे जा बैठा
आने वाला कल है
इन दोनों के हाथ को पकडे घिसट रहा है तीसरा भाई "आज"
फिर एक हों जाएँ तीनो इसी कवायद में
"आज " कभी गुज़रे कल की तरफ दौड़ता है
उसको देकर सहारा अपने घर में ला बिठाता है
और उसके ज़ख्मों पर मरहम लगता है
कभी पंजों के बल खड़े होकर
करता है कोशिश चूमने की आने वाले कल को
एक कदम ऊंचा हो जाता है "आज"
रोज़ उस पेड़ की टहनी पकड़कर
हर रोज़ मगर आने वाला कल
ऊपर चढ़ता जाता है पेड़ की फुलंग पर
और पीछे छूटता जाता है हर रोज़ गुज़रा हुआ कल
इन्ही दोनों कलों की हसरत लिए
सदियों से खुद से बेखबर
ये "आज" चल रहा है मुसलसल
हम तीनो शायद एक हों जायें कभी
फिर लौट के माँ के घर जाएँ कभी

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