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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, August 18, 2013

कल, आज और कल

सदियों पहले की बात है कि
एक दफा गुस्से से फूलकर
धरती पर आ गिरा था वक़्त
अपनी माँ की गोद से कूदकर
और बंट गया था तीन टुकड़ों में वजूद उसका
कल, आज और कल

वो हिस्सा जो ज़ख़्मी होकर नीचे की तरफ लुढ़क गया था
गुज़रा कल कहलाया
वो हिस्सा जो उचक के ऊंचे पेड़ पे जा बैठा
आने वाला कल है
इन दोनों के हाथ को पकडे घिसट रहा है तीसरा भाई "आज"

फिर एक हों जाएँ तीनो इसी कवायद में
"आज " कभी गुज़रे कल की तरफ दौड़ता है
उसको देकर सहारा अपने घर में ला बिठाता है
और उसके ज़ख्मों पर मरहम लगता है
 

कभी पंजों के बल खड़े होकर
करता है कोशिश चूमने की आने वाले कल को
एक कदम ऊंचा हो जाता है "आज"
रोज़ उस पेड़ की टहनी पकड़कर
हर रोज़ मगर आने वाला कल
ऊपर चढ़ता जाता है पेड़ की फुलंग पर
और पीछे छूटता जाता है हर रोज़ गुज़रा हुआ कल

इन्ही दोनों कलों की हसरत लिए
सदियों से खुद से बेखबर
ये "आज" चल रहा है मुसलसल
हम तीनो शायद एक हों जायें कभी
फिर लौट के माँ के घर जाएँ कभी


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