ऊंघती खामोश रात में कुछ दाढ़ीयों से नज़रें बचाकर
मस्जिद ने मंदिर की तरफ देखा और फुसफुसाई
कैसे हो भैया
सोये हुए त्रिशूलों की तरफ देखकर मंदिर अहिस्ता से बोला
कैसे कह दूं बहन की सब कुछ ठीक है
क्या थे और क्या हो गएँ हैं हम तुम
अपने जिन बच्चों को हमने वसुधैव कुटम्बकम सिखलाया था
आरतियों,अजानों में जिनको अमन-ओ-चैन का पाठ पढाया था
कैसे उन्ही अपनों के हाथों के हम खिलौने हो गए
प्रेम गीत गाते गाते नफरत के बिछौने हो गए
नम आँखों से कुछ कराहती सी बोली मस्जिद
जिनको सिखाया था हमने इंसान होना
उन्ही ने हमको राजनीति का मोहरा बना डाला
अपने स्वार्थों की खातिर
कभी हमको बना डाला कभी हमको मिटा डाला
कांपते हाथों से फिर मस्जिद ने राखी बाँधी मंदिर की कलाई पर
सुबक सुबक के रोया मंदिर काबू न रहा उसको रुलाई पर
तभी कुछ आहट सी हुई और दोनों चौकन्ने से हो हो गए
रक्षाबंधन के दिन भी दो भाई बहन फिर दुश्मन से हो गए
मस्जिद ने मंदिर की तरफ देखा और फुसफुसाई
कैसे हो भैया
सोये हुए त्रिशूलों की तरफ देखकर मंदिर अहिस्ता से बोला
कैसे कह दूं बहन की सब कुछ ठीक है
क्या थे और क्या हो गएँ हैं हम तुम
अपने जिन बच्चों को हमने वसुधैव कुटम्बकम सिखलाया था
आरतियों,अजानों में जिनको अमन-ओ-चैन का पाठ पढाया था
कैसे उन्ही अपनों के हाथों के हम खिलौने हो गए
प्रेम गीत गाते गाते नफरत के बिछौने हो गए
नम आँखों से कुछ कराहती सी बोली मस्जिद
जिनको सिखाया था हमने इंसान होना
उन्ही ने हमको राजनीति का मोहरा बना डाला
अपने स्वार्थों की खातिर
कभी हमको बना डाला कभी हमको मिटा डाला
कांपते हाथों से फिर मस्जिद ने राखी बाँधी मंदिर की कलाई पर
सुबक सुबक के रोया मंदिर काबू न रहा उसको रुलाई पर
तभी कुछ आहट सी हुई और दोनों चौकन्ने से हो हो गए
रक्षाबंधन के दिन भी दो भाई बहन फिर दुश्मन से हो गए

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