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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Wednesday, August 21, 2013

रक्षाबंधन

ऊंघती खामोश रात में कुछ दाढ़ीयों से नज़रें बचाकर
मस्जिद ने मंदिर की तरफ देखा और फुसफुसाई
कैसे हो भैया
सोये हुए त्रिशूलों की तरफ देखकर मंदिर अहिस्ता से बोला
कैसे कह दूं बहन की सब कुछ ठीक है

क्या थे और क्या हो गएँ हैं हम तुम
अपने जिन बच्चों को हमने वसुधैव कुटम्बकम सिखलाया था
आरतियों,अजानों में जिनको अमन-ओ-चैन का पाठ पढाया था
कैसे उन्ही अपनों के हाथों के हम खिलौने हो गए
प्रेम गीत गाते गाते नफरत के बिछौने हो गए

नम आँखों से कुछ कराहती सी बोली मस्जिद
जिनको सिखाया था हमने इंसान होना
उन्ही ने हमको राजनीति का मोहरा बना डाला
अपने स्वार्थों की खातिर
कभी हमको बना डाला कभी हमको मिटा डाला

कांपते हाथों से फिर मस्जिद ने राखी बाँधी मंदिर की कलाई पर
सुबक सुबक के रोया मंदिर काबू न रहा उसको रुलाई पर
तभी कुछ आहट सी हुई और दोनों चौकन्ने से हो हो गए
रक्षाबंधन के दिन भी दो भाई बहन फिर दुश्मन से हो गए

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