जिस तरह किसी ने रेत पे हर्फ़ लिखकर मिटाया हो
उस तरह जिस शख्श ने मुझे चाहा और भुलाया हो
वो अब भी इस तरह से क्यूँ है शामिल मुझमें
कि हर किसी को मुझमें वो नज़र आता है अब भी
मैं किसी देश, किसी शहर ,किसी राह चला जाऊं
वो मेरी बाजू से गुज़र जाता है अब अभी
अक्स नज़र आता है उसी का मेरे अंदाज़-ओ-तास्सुरात में
ज़िक्र आता है उसका खुद-ब-खुद मेरी कही हर बात में
जाने क्यूँ उसको रस्म-ए-मुहब्बत निभाना नहीं आया
जाने क्यूँ मुझे उसको याद करके भुलाना नहीं आया
उस तरह जिस शख्श ने मुझे चाहा और भुलाया हो
वो अब भी इस तरह से क्यूँ है शामिल मुझमें
कि हर किसी को मुझमें वो नज़र आता है अब भी
मैं किसी देश, किसी शहर ,किसी राह चला जाऊं
वो मेरी बाजू से गुज़र जाता है अब अभी
अक्स नज़र आता है उसी का मेरे अंदाज़-ओ-तास्सुरात में
ज़िक्र आता है उसका खुद-ब-खुद मेरी कही हर बात में
जाने क्यूँ उसको रस्म-ए-मुहब्बत निभाना नहीं आया
जाने क्यूँ मुझे उसको याद करके भुलाना नहीं आया

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