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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Saturday, September 7, 2013

मुसलसल इंतज़ार


एक पलड़े में
कुछ बुझे बुझे से चाँद
कुछ, अंधेरों में डूबे हुए सूरज
रास्ते को पथराई आँखों से
तकती मेरी दहलीज़
और कभी ना ख़तम होने वाला इंतज़ार
ज़िन्दगी की रोज़मर्रा की ज़रूर्यियात
अपनों के मशविरे और
गैरों के तंज़ की बरसात

दुसरे पलड़े में मुझमें बिखरे हुए तुम
और मुझको को बांहों में समेटती
तुम्हारी मखमली याद

इन दोनों पलड़ों के संतुलन में
कभी पूरी तरह हताश,
कभी आगे बढ़ जाने की
पलकों पर बाले हुए आस
कभी खुद से भागता सा
कभी साँसों की लम्बाई
बिलान्दो से नापता सा
मैं

तुमसे बिछड़कर यूँ
मिला करती है अब
मुझसे हर रोज़ ज़िन्दगी

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