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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Tuesday, December 28, 2010

धूप का रिश्ता

धूप का जाने क्या रिश्ता है 
उन ऊंची पहाड़ी के पेड़ों से
सुबह सवेरे सबसे पहले 
उनकी ज़ुल्फें चूमा करती है 
जाने क्या क्या बातें करती हैं 
लिपट लिपट कर उन पेड़ों से 
नीचे उतरा करती है 
                  धूप का जाने क्या रिश्ता है 
शाम ढले जब आवाज़ें देता है सूरज 
"अपनी चादर तुरत समेटो 
और चलो संग मेरे अब तुम " 
बूढ़ी धूप उन्ही पेड़ों को पकड़कर 
सूरज तक का रस्ता तय करती है 
पूरे दिन का लेखा-जोखा 
उन पेड़ों को समझाकर
फिर आने का वादा करके 
फिर उस पार उतरती है 
                  धूप का जाने क्या रिश्ता है 

2 comments:

  1. अच्छा लिखा है... अंतिम पंक्तियाँ बहुत सुन्दर हैं ...

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  2. उम्दा। बधाई स्वीकार करे।

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