सर्द ख़ामोश रात का वो मंज़र,
ओढ़ रख्खी थी पहाड़ों ने, बर्फ की एक कोरी चादर,
सोती थी चाँदनी उनींदी सी, उस चादर पे सर रखकर,
मेरी बाँहों के दरमियाँ, तेरी साँसों की वो सरगोशियाँ,
तुम भी चुप थीं, मैं भी चुप था,
सर्द हवाओं की मगर वो सीटियाँ,
पास में बहती वो पहाड़ी नदी,
और पत्थरों से पानी की वो गुफ्तगू,
तेरी खुशबू से महकता वो मेरा ज़हन,
मेरी छुअन से लरज़ता वो तेरा बदन,
वो रूह से रूह की करीबियों की रात थी,
तुम्हें याद होगा वो अपनी आख़िरी मुलाक़ात थी,
चाँद मलता रहा चाँदनी तेरी ज़ुल्फों में रात भर,
अश्कों की तपिश से पिघलती रही
वो बर्फ की चादर रात भर,
फिर सहर ने दी दस्तक कुछ इस तरह
कि जिंदगी अंधेरों में खो गयी,
वो चाँदनी, जो तेरे चेहरे को छू रही थी
तेरी ज़ुल्फों के बीच से रहगुज़र तलाशकर,
मैं उसके चंद क़तरे दबोच लाया था
अपनी भीगी उदास पलकों में,
मैं स्याह अंधेरों से लड़ते लड़ते
जब भी थक सा जाता हूँ,
उस चाँदनी के वो चंद क़तरे
अपनी आँखों में मला करता हूँ
किसी सुरमे की तरह,
और मुझको गुमां होता है यूँ
गोया मैं जी रहा हूँ वही सर्द रात फिर से,
तेरी बाँहों के दरमियाँ...
तेरी साँसों के तले ....

nice one!!
ReplyDeleteउस चाँदनी के वो चंद क़तरे
ReplyDeleteअपनी आँखों में मला करता हूँ
किसी सुरमे की तरह,
और मुझको गुमां होता है यूँ
गोया मैं जी रहा हूँ वही सर्द रात फिर से,
खुबसूरत अहसासों को समेटे ,दिल कि गहराई से लिखी गयी रचना ,बधाई
धन्यवाद एवं आभार हौसलाअफजाई के लिए
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