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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Friday, February 11, 2011

वो सर्द रात

सर्द ख़ामोश रात का वो मंज़र,
ओढ़ रख्खी थी पहाड़ों ने, बर्फ की एक कोरी चादर,
सोती थी चाँदनी उनींदी सी, उस चादर पे सर रखकर,
मेरी बाँहों के दरमियाँ, तेरी साँसों की वो सरगोशियाँ,
तुम भी चुप थीं, मैं  भी चुप था,
सर्द हवाओं की मगर वो सीटियाँ,
पास में बहती वो पहाड़ी नदी,
और पत्थरों से पानी की वो गुफ्तगू,
तेरी खुशबू से महकता वो मेरा ज़हन,
मेरी छुअन से लरज़ता वो तेरा बदन,
वो रूह से रूह की करीबियों की रात थी,
तुम्हें  याद होगा वो अपनी आख़िरी  मुलाक़ात थी,
चाँद मलता रहा चाँदनी तेरी ज़ुल्फों में रात भर,
अश्कों की तपिश से पिघलती रही
वो बर्फ की चादर रात भर,
फिर सहर ने दी दस्तक कुछ इस तरह 
कि जिंदगी अंधेरों में खो गयी,
वो चाँदनी, जो तेरे चेहरे  को छू रही थी
तेरी ज़ुल्फों के  बीच से रहगुज़र तलाशकर,
मैं उसके चंद क़तरे दबोच लाया था 
अपनी भीगी उदास पलकों में,
मैं स्याह अंधेरों से लड़ते लड़ते 
जब भी थक सा जाता हूँ,
उस चाँदनी के वो चंद क़तरे 
अपनी आँखों में मला करता हूँ 
किसी सुरमे की तरह, 
और मुझको गुमां होता है यूँ
गोया मैं जी रहा हूँ वही सर्द रात फिर से, 

      तेरी बाँहों के दरमियाँ... 
                                          तेरी साँसों के तले .... 
    

3 comments:

  1. उस चाँदनी के वो चंद क़तरे
    अपनी आँखों में मला करता हूँ
    किसी सुरमे की तरह,
    और मुझको गुमां होता है यूँ
    गोया मैं जी रहा हूँ वही सर्द रात फिर से,
    खुबसूरत अहसासों को समेटे ,दिल कि गहराई से लिखी गयी रचना ,बधाई

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  2. धन्यवाद एवं आभार हौसलाअफजाई के लिए

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