तमाम
मैं वाकिफ नहीं था
जिनके नामों से भी
कहाँ से आते थे, वो क्या करते थे.
ये भी मालूम नहीं था मुझको
बस यूँ ही रोज़ दिखा करते थे
वो अजनबी चेहरे....
कभी चाय की ठेली पर,
कभी ट्रेन में,
कभी सड़क पर आते जाते.
बरसों बीत है दिल्ली छोड़े
पर अब भी वो याद आते हैं,
ना जाने कहां होंगे, ना जाने कैसे होंगे,
ना मालूम कि होंगे भी कि नहीं होंगे,
वो अजनबी चेहरे ............
वो लोग
जो अनजाने ही बन जाते हैं
हमसफ़र हमारे
गाहे-बगाहे
हमारी यादों को महकाते हैं
कभी कभी जीवन के सफर में
किसी अपने की तरह याद आते हैं
वो अजनबी चेहरे .......

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