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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, October 3, 2010

एक उम्मीद

मेरे कमरे में जो बिखरे रहते हैं
बेतरतीब से पन्ने ये
इन पन्नों में दरअसल
मैं ही तो हूँ
हर रोज़ बिखरता हूँ इन वर्कों पर
मैं खुद ही अशआर बनकर
हर रोज़ जला करती है
एक उम्मीद दिए सी
शायद ......
तुम लौट के आओ इक दिन
और फिर से समेटो मुझको
शायद  मैं फिर से

        इक मुक़म्मल किताब  हो जाऊं

1 comment:

  1. बहुत प्यारा Thought है बंधू....

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