मेरे कमरे में जो बिखरे रहते हैं
बेतरतीब से पन्ने ये
इन पन्नों में दरअसल
मैं ही तो हूँ
हर रोज़ बिखरता हूँ इन वर्कों पर
मैं खुद ही अशआर बनकर
हर रोज़ जला करती है
एक उम्मीद दिए सी
शायद ......
तुम लौट के आओ इक दिन
और फिर से समेटो मुझको
शायद मैं फिर से
इक मुक़म्मल किताब हो जाऊं
Sunday, October 3, 2010
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बहुत प्यारा Thought है बंधू....
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