Friday, March 19, 2010
ज़िंदा नज़्म
तन्हाई गम और अश्कों से वाबस्त:,
कोशिशन जो ग़ज़लें नज़्में लिख्खी थी,
बेमानी, बिना रूह के जिस्म सी लगती हैं,
लेकिन जिस दिन जुदा हुई थीं,
तुम्हारी राहों से मेरी रहगुज़र,
जून की तन्हा गर्म दोपहरी में,
में घंटो रोया था,
अपने कमरे को बंद करके,
उन अश्कों की स्याही को,
मैंने सफहे: पे उतारा था,
और इक नज़्म लिखी थी,
बरसों बीत गए है तुमसे बिछड़े,
तुम्हारा अक्स भी,
अब धुँधला सा हो गया है,
यादों के आईने मैं,
लेकिन अब तक गीली है,
इस नज़्म की स्याही,
हर्फ़-ब-हर्फ़ अभी भी,
सच्ची लगती है जिंदा लगती है,
इस सफहे: से गुज़रता हूँ जब भी,
पुर-अश्क तुम्हारी वो आँखे,
जिनसे तुमने छुआ था मुझे,
आखरी मर्तबा स्टेशन पर,
सफहे: पे उभर आती हैं,
यही फ़र्क है,
लफ़्ज़ पिरोने में
और
अलफ़ाज़ों को जीने में.....
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