बरगद तो पहले भी देखा है,
कई मर्तबा मैंने,
खड़ा हुआ है मेरे घर के पिछवाड़े,
इतनी शाखें इतने पत्ते बाहों में उठाये,
कि गिनना नामुमकिन है उनको,
पर जब से तुम्हे मिला हूँ,
में ये सोच रहा हूँ,
नन्हा सा बीज कभी था,
ये लंबा चौड़ा बरगद भी,
बिलकुल ऐसे ही,
जैसे अपने रिश्ते कि उम्र अभी है कच्ची कच्ची,
चलो दबाकर देखें हम भी,
इस रिश्तें को मिट्टी में,
शायद इसमें से भी,
ऐसा ही इक बरगद निकले,
बरगद में लाखों शाखें फूटें,
फल पाने कि ख्वाहिश बरगद से,
ना तुम रख्खो ना में रख्खुं,
गरम दोपहरी आती हैं जब,
जीवन कि राहों में,
ये रिश्तों के बरगद छांह घनी देते है हमको
चलो दबाकर देखें हम भी
इस रिश्ते को मिट्टी में.......
Monday, March 29, 2010
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