घनी रातों के ये साये
मेरे घर में चले आये
जिस्म में सांस घुटती है
रूह फ़रियाद करती है
मेरी दहलीज़ से रिश्ता
कोई सूरज नहीं रखता
मेरी छत की मुंडेरों को
कोई चंदा नहीं तकता
सितारे, चाँद, सूरज, तु
लुटा महलों पे या रब्बा
मेरी मायूस खिडकी पर
कभी चुपके से बस रखजा.
मुठ्ठी भर चांदनी.....
Wednesday, March 10, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment