खिडकी रात खुली थी शायद, खिडकी पर यादों को देखा |
ठंड से थर थर कांपते मैंने बिछड़े कुछ ख्वाबों को देखा ||
सहमे सहमे ख़्वाबों को मैंने पास बुलाया,
नन्ही नन्ही बर्फ जमी थी पलकों पर,
झाड पोंछ कर उनको एक शाल उढाया,
फिर यादों के दाने डाले और कुट-कुट करके खाते देखा
ठंड से ........................
उनके हाथों में गुज़रे लम्हों की एक गठरी थी,
उसमे से कुछ लम्हे
झाँक रहे थे टुकर टुकर
मुझको ही बस वो
ताक रहे थे टुकर टुकर
एक एक करके फिर लम्हों को कमरे में छा जाते देखा
ठंड से ...........................
कितने चेहरे कितने लम्हे उस दिन हुए नुमाया
कितने सपने कितने अपने में फिर से जी आया
कितनी रातों के चाँद मिले
कितनी सुबहों ने मुझको सहलाया
अपने आज को उस दिन मैंने कल से हाथ मिलाते देखा
ठंड से ................................
सुबह की दस्तक पर फिर वो लम्हे जाने लगे
कितना रोका उनको मैंने वो हाथ छुड़ाने लगे
सारे लम्हे चले गए पर तन्हा एक खड़ा था
परदेस आते वक्त जो फूट के रोई थी,
गौर से देखा तो वो लम्हा,
मेरी वो माँ था
घंटों तक उस दिन वो लम्हा जमकर रोया
में खिडकी के अंदर
वो खिडकी के बाहर रोया
नम आँख लिए खामोश जबां फिर लम्हे को जाते देखा
ठंड से .................................
Monday, March 8, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

kya baat hai...maza aa gaya dost.
ReplyDelete