कल, शाम के धुंधलके में,मेरे काँधे के सहारे ,
बारिश में भीगे ताज़ा रस्ते पर,
चलते चलते यूँ ही,
सरगोशी की शक्ल में तुमने,
कुछ अलफ़ाज़ उछाले थे,
मेरी जानिब,
लेकिन मुझको छूने से पहले,
बिजली की गुर्राहट ने,
उन अल्फाज़ों को निगल लिया था,
कतरा कतरा बिखर गयी थी सरगोशी,
कुछ कतरे रस्ते पर बिखरे,
कुछ चस्पां हुए पत्तों पर,
और बाक़ी सब को,
डकार गयी थी भूखी हवा,
आकर देखो,
हर सू गुलपोशी का मंज़र है,
ये दरख़्त,ये हवा, ये रहगुज़र,
सरगोशी के उन कतरों से,
गोया लदे खड़े है,
कल शाम तुम्हारे होठों से,
जो फिसल गए थे.....
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