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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Friday, March 12, 2010

सरगोशी

कल, शाम के धुंधलके में,
मेरे काँधे के सहारे ,
बारिश में भीगे ताज़ा रस्ते पर,
चलते चलते यूँ ही,
सरगोशी की शक्ल में तुमने,
कुछ अलफ़ाज़ उछाले थे,
मेरी जानिब,
लेकिन मुझको छूने से पहले,
बिजली की गुर्राहट ने,
उन अल्फाज़ों को निगल लिया था,
कतरा कतरा बिखर गयी थी सरगोशी,
कुछ कतरे रस्ते पर बिखरे,
कुछ चस्पां हुए पत्तों पर,
और बाक़ी सब को,
डकार गयी थी भूखी हवा,
आकर देखो,
हर सू गुलपोशी का मंज़र है,
ये दरख़्त,ये हवा, ये रहगुज़र,
सरगोशी के उन कतरों से,
गोया लदे खड़े है,
कल शाम तुम्हारे होठों से,
जो फिसल गए थे.....

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