अब वो लुत्फ कहाँ बिमारी में,
जो तब था, जब तुम थी माँ,
राह तका करता था मैं,
तबियत कब नासाज़ ये होगी,
खाट बिछाकर आँगन में,
सारी दुनिया छोड़-छाड़ कर,
तुम बैठी रहती थीं,
मेरे सिरहाने दिन भर,
मुझको अपनी गोद में लेकर ,
नीली पीली गोली खाने के एवज़ में,
में तुमसे मनवा लेता था,
वो तमाम ख्वाहिशें अपनी,
जो मुल्तवी होती थी ,
पिछले कई महीनों से,
वज़नी बस्ता, होमवर्क से कुश्ती, बाबा की झिडकी,
सबसे छुट्टी मिल जाती थी खुद-ब-खुद,
जो बात बात पर गाल पे चांटा रखते थे,
वो टीचर भी पूछा करते थे,
खुद घर आ आकर,'' अब कैसे हो ?
में भी कोशिश करता था पूरी,
ऐसा दिखने की,
जैसे स्कूल ना आ पाने से बड़ा दुखी हूँ,
मेरे बालों को सहलाकर,
कह जाते थे वो ,
'' क्लास की कोई फ़िक्र न करना
जब तक बीमार हो तुम
आराम करो बस ''
आह... अब वो लुत्फ कहाँ बीमारी में,
अब बीमारी से, में डरता हूँ माँ,
तन्हा हूँ न...
ना तुम हो, ना आँगन है,
न बाबा, ना थप्पड़ वाले सर हैं,
ना नीली पीली गोली हैं,
न गोली खाने की शर्तें हैं,
तब बीमारी का मानी रौनक थी,
अब बीमारी का मतलब तन्हाई है,
अब वो लुत्फ कहाँ बीमारी में .....
Saturday, March 13, 2010
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bahut khoob... bachpan ki yaad taza ho jati hai is kavita ko padhkar.
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