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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, March 21, 2010

सिलसिला


जब से तुमसे जुदा हुआ हूँ
ये रोज़ का सिलसिला सा है 
                            ज्यूँ ही नींद मुझे 
                            आगोश में लेती है
                            तुम मिलने आ जाती हो
                            ख़्वाबों के आँगन में
ना कुछ कहती हो
ना शिकवा करती हो 
बस चुपचाप तका करती हो मुझको
                           रात पिघलती रहती है 
                           तुम रोती रहती हो
                           ख़ामोशी से
सुबह जब उठता हूँ 
अश्क पड़े मिलते है बिस्तर पर
                           उन्हें उठाकर पन्नों पर पिन कर लेता हूँ
                           अल्फ़ाज़ों कि शक्ल पहनाकर
                           और इक नज़्म सी बन जाती है
दुनिया को लगता है
में अच्छा लिखता हूँ
ये रोज़ का सिलसिला सा है ......

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