जब से तुमसे जुदा हुआ हूँ
ये रोज़ का सिलसिला सा है
ज्यूँ ही नींद मुझे
आगोश में लेती है
तुम मिलने आ जाती हो
ख़्वाबों के आँगन में
ना कुछ कहती हो
ना शिकवा करती हो
बस चुपचाप तका करती हो मुझको
रात पिघलती रहती है
तुम रोती रहती हो
ख़ामोशी से
सुबह जब उठता हूँ
अश्क पड़े मिलते है बिस्तर पर
उन्हें उठाकर पन्नों पर पिन कर लेता हूँ
अल्फ़ाज़ों कि शक्ल पहनाकर
और इक नज़्म सी बन जाती है
दुनिया को लगता है
दुनिया को लगता है
में अच्छा लिखता हूँ
ये रोज़ का सिलसिला सा है ......
ये रोज़ का सिलसिला सा है ......

बहुत ख़ूब रवि भाई।
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