Wednesday, March 10, 2010
परदेस
अपनी शाखों पर बैठे क्या जानो,परदेस में होना क्या होता है
परदेसी परिंदे से पूछो , कि परदेस को ढोना क्या होता है
रूह तो पीछे छूट गयी है, बिछड़ी यादों की गलियों में
बेगाने रस्तों पर खाली जिस्म को ढोना क्या होता है
अपनी मिट्टी से दूर कहीं वो पहली शाम की दस्तक
कमरे में तन्हा बैठे- बैठे आँख भिगोना क्या होता है
रात ने ज्यूँ ही चादर तानी,ये दिल खिडकी से कूद गया
भाग-भाग कर दिल के पीछे रात को खोना क्या होता है
भूली बिसरी याद का आटा मलकर, बीते वक्त के पानी में
अपने आज को चूल्हा करके गर्म चपाती पोना क्या होता है
कभी - कभी जब चिड़िया कोई अपने बच्चे को दाना दे
बिना किसी से कुछ भी कहे गुमसुम होना क्या होता है
जब मौत मुखातिब हो हमसे अपनी धरती का सीना हो
इसी फ़िक्र को ओढ़ बिछा कर जगना सोना क्या होता है
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