दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि
Saturday, March 13, 2010
ख़लिश
मैं रास्तों में बहुत खुश था,
कितना तन्हा हूँ मंजिल पे पहुँच कर,
या खुदा,
फिर वो रास्तों की कशिश दे दे,
ज़िद के कपडे पहनकर,
क़तारों में खड़े,
वो ख़्वाबों के कारवां,
और ज़िन्दगी की वो दुश्वारियां,
वो ख़लिश दे दे
आपका आभारी हूँ की आपने मेरा साहस बढ़ाया प्रकाश,में जानता हूँ की अपने मन के उदगार व्यक्त करने में शायद लेखनी की उन बहुत सारी मर्यादाओं को में नहीं निभा पाया होऊंगा जो निर्धारित हैं.उन के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|
ravi bhai bahut achcha laga aapkee kavitayen padh kar.sach mein dil khush ho gaya. :-)
ReplyDeleteआपका आभारी हूँ की आपने मेरा साहस बढ़ाया प्रकाश,में जानता हूँ की अपने मन के उदगार व्यक्त करने में शायद लेखनी की उन बहुत सारी मर्यादाओं को में नहीं निभा पाया होऊंगा जो निर्धारित हैं.उन के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|
ReplyDeleteक्या बात है ... बहुत बढ़िया दोस्त. ऐसे ही लिखे जाओ ...बस |
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