Tuesday, March 9, 2010
ऐक्ट्रेस
कल शाम मिली थी वो,
बिलकुल वैसे ही जैसे,
दिन की सूली से उतरकर,
शाम आती है मेरी खिडकी पर,
तन्हा, खामोश-ज़बां, बेरौनक सी,
गौर से देखा तो जाना,
डसा गया है रूह को उसकी,
दिल ने चाहा, रख दूं होठों को,
मैं उसके ज़ख्मों पर,
और ज़हर सूंत कर सारा,
नीली रूह को जिंदा कर दूं,
पर नाग ने शायद डसा जो होता,
तो कुछ हो भी सकता था,
उसकी रूह को डंक लगा था ,
उसकी रूह को ज़हर चढा था ,
ख़्वाबों का,
ख़्वाब उगाने का हर्ज़ाना,
ज़िन्दगी शायद मांग रही है उससे,
किश्त दर किश्त,
उसका खूबसूरत जिस्म,
और वो तोल रही है,
दिल ही दिल में,
ख़्वाब बड़ा है ?
जिस्म बड़ा है ?
या फिर
रूह बड़ी है ?
कल शाम मिली थी वो .....
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i loved it , beautiful kavita . kya kahu mai iss kavita ke piche chupe gaharayi aur khubsurti to samaz ne ki nakamayab koshish kar rahi hu. kyonki muze pata hai jitni koshish karungi utni aur andar baheti chali jaungi.
ReplyDeleteक्या बात है दोस्त... एक एक्ट्रेस की उलझन को बड़ी खूबसूरती से लफ़्ज़ों में ढला गया है...
ReplyDeletethanks monali, thanks nishant
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