Wednesday, June 16, 2010
ज़िन्दगी
मुझको बाहों में झुलाकर वो पलकें झपकाना भूल गयी|
नींद मेरी दहलीज़ तक आकर, अंदर आना भूल गयी||
अब सरकेगा तब सरकेगा बस इसी तव्वको में थे हम|
ज़िन्दगी सामने बैठी रही पर घूंघट सरकाना भूल गयी||
पलकों पे हंसी हम लिखते हैं,पर अश्क दरारों से दिखते हैं |
हमसे मिलकर हंसी भी गोया आँखें मटकाना भूल गयी||
जाने क्या जादू करते है ये ऊंची ईमारत के गुम्बद भी|
धूप सवेरे निकली तो थी, पर मेरे घर आना भूल गयी||
बस एक ख़्वाब का जुर्माना ये लम्हे अब तक चुका रहे |
एक ख़्वाब से मिली ज़िन्दगी और ठौर-ठिकाना भूल गयी ||
खेल रही थी हमसे मिलकर छुपा-छुपी का खेल खुशी |
सांझ तले तक छुपे थे हम वो आवाज़ लगाना भूल गयी
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आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।
ReplyDeleteधन्यवाद मनोज जी आप जिस तरह से मेरी रचनाओं पर अपने विचार अभिव्यक्त करते है उससे मेरा साहस बढ़ता है|
ReplyDeleteमें एक बात के लिए क्षमाप्राथी हूँ कि लेखन के बारे में मेरी समझ बहुत ही कम है, इसिलिए अक्सर मेरी रचनाये लेखन की कुछ विधाओं में, मात्राओं कि जो बंदिशें हैं उनपर खरी नहीं उतरती|
जो मेरे दिल में भाव आतें है में अपनी सुविधानुसार उन्हें शब्दों में ढालने भर कि कोशिश करता हूँ|