1.txt
Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Wednesday, June 16, 2010

ज़िन्दगी


मुझको बाहों में झुलाकर वो पलकें  झपकाना भूल गयी|
नींद मेरी दहलीज़ तक आकर, अंदर आना भूल गयी||

अब सरकेगा तब  सरकेगा बस इसी तव्वको में थे हम|
ज़िन्दगी सामने बैठी रही पर घूंघट सरकाना भूल गयी||

पलकों पे  हंसी हम लिखते हैं,पर अश्क दरारों से दिखते हैं |
हमसे मिलकर हंसी भी गोया आँखें मटकाना भूल गयी||

जाने क्या जादू करते है ये ऊंची ईमारत के गुम्बद भी|
धूप सवेरे निकली तो थी, पर मेरे घर आना भूल गयी||

बस एक ख़्वाब का जुर्माना ये लम्हे अब तक चुका रहे |
एक ख़्वाब से मिली ज़िन्दगी  और ठौर-ठिकाना भूल गयी ||

खेल रही थी हमसे मिलकर छुपा-छुपी का खेल खुशी |
सांझ तले तक छुपे थे हम वो आवाज़ लगाना भूल गयी

2 comments:

  1. आप की इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

    ReplyDelete
  2. धन्यवाद मनोज जी आप जिस तरह से मेरी रचनाओं पर अपने विचार अभिव्यक्त करते है उससे मेरा साहस बढ़ता है|
    में एक बात के लिए क्षमाप्राथी हूँ कि लेखन के बारे में मेरी समझ बहुत ही कम है, इसिलिए अक्सर मेरी रचनाये लेखन की कुछ विधाओं में, मात्राओं कि जो बंदिशें हैं उनपर खरी नहीं उतरती|
    जो मेरे दिल में भाव आतें है में अपनी सुविधानुसार उन्हें शब्दों में ढालने भर कि कोशिश करता हूँ|

    ReplyDelete