रात ने मुंह पर स्याही पोती, याद वो मकतूल ज़माने आये
जो कभी हँसने का सबब थे, आज वो लम्हात रुलाने आये
मेरे घर की दहलीज़ नहीं सोई, तेरे क़दमों से जुदा होकर
हर शाम तका करती है रस्ते, काश तू आज सुलाने आये
मुठ्ठी भर सन्नाटें ओढकर, गुज़रे लम्हों के बिस्तर पर
आँखों की खुरचन से जलती है, कोई ये रात बुझाने आये
अश्कों के मरासिम हैं पक्के, अश्कों में वफ़ादारी है बाकी
कौन निभाए इतना, रातों में सुलाने सुबह में जगाने आये
कितने लम्हें, रिश्तें, शक्लें धरतें हैं शब-भर दीवारों पर
हर रात कोई धुंधला सा चेहरा, घर में रात बिताने आये
कुछ भीगे से लम्हों ,में तेरे शाने मय्यसर हो जाएँ बस
हमने कहाँ तमन्ना की, तू हर पल साथ निभाने आये
Sunday, June 20, 2010
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