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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, June 20, 2010

इंतज़ार

रात ने मुंह पर स्याही पोती, याद वो मकतूल ज़माने आये
जो कभी हँसने का सबब थे, आज वो लम्हात रुलाने आये

मेरे घर की दहलीज़ नहीं सोई, तेरे क़दमों से जुदा होकर
हर शाम तका करती  है रस्ते, काश तू आज सुलाने आये

मुठ्ठी भर सन्नाटें ओढकर, गुज़रे लम्हों के बिस्तर पर
आँखों की  खुरचन से जलती है, कोई ये रात बुझाने आये

अश्कों के मरासिम हैं पक्के, अश्कों में वफ़ादारी है बाकी
कौन  निभाए इतना, रातों में सुलाने सुबह में जगाने आये

कितने लम्हें, रिश्तें,  शक्लें धरतें हैं शब-भर दीवारों पर
हर रात कोई धुंधला सा चेहरा,  घर में रात बिताने आये

कुछ भीगे से लम्हों ,में तेरे शाने मय्यसर हो जाएँ बस
हमने कहाँ तमन्ना की, तू हर पल साथ निभाने आये  

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