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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Sunday, June 20, 2010

रात

इस दिल में पिघलते रहे, जज़्बात जाने क्या क्या
हमसे करती रही गुफ्तगू, ये रात जाने क्या क्या

ज़िन्दगी सिमटी तो महज़  रवायत-ऐ-रोज़मर्रा रह गयी
पलते थे कभी इसमें ख्वाबो-खयालात  जाने क्या क्या

मेरे वालिदान की उम्र से बड़ा, खंडहर में  जो दरखत है
रात में दीवारों से करता है सरगोशियात जाने क्या क्या

चेहरे को गडाकर तकिये में जब घंटो लेटा रहता हूँ में
सुर्ख आँखों में ढूँढता है बिस्तर सवालात जाने क्या क्या

घर में घुसते ही आईने तमाम, में घर के बुझा देता हूँ
वर्ना चेहरे पे उभरते है खरोचों-निशानात जाने क्या क्या

वक्ते रुख्सत ऐ ज़िन्दगी एक नफस ना उधार दिया तूने
उम्र भर पूरा किये हम, तेरी ज़रूरियात जाने क्या क्या

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