एक पलड़े में
कुछ बुझे बुझे से चाँद
कुछ, अंधेरों में डूबे हुए सूरज
रास्ते को पथराई आँखों से
तकती मेरी दहलीज़
और कभी ना ख़तम होने वाला इंतज़ार
ज़िन्दगी की रोज़मर्रा की ज़रूर्यियात
अपनों के मशविरे और
गैरों के तंज़ की बरसात
दुसरे पलड़े में मुझमें बिखरे हुए तुम
और मुझको को बांहों में समेटती
तुम्हारी मखमली याद
इन दोनों पलड़ों के संतुलन में
कभी पूरी तरह हताश,
कभी आगे बढ़ जाने की
पलकों पर बाले हुए आस
कभी खुद से भागता सा
कभी साँसों की लम्बाई
बिलान्दो से नापता सा
मैं
तुमसे बिछड़कर यूँ
मिला करती है अब
मुझसे हर रोज़ ज़िन्दगी





