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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Saturday, September 7, 2013

मुसलसल इंतज़ार


एक पलड़े में
कुछ बुझे बुझे से चाँद
कुछ, अंधेरों में डूबे हुए सूरज
रास्ते को पथराई आँखों से
तकती मेरी दहलीज़
और कभी ना ख़तम होने वाला इंतज़ार
ज़िन्दगी की रोज़मर्रा की ज़रूर्यियात
अपनों के मशविरे और
गैरों के तंज़ की बरसात

दुसरे पलड़े में मुझमें बिखरे हुए तुम
और मुझको को बांहों में समेटती
तुम्हारी मखमली याद

इन दोनों पलड़ों के संतुलन में
कभी पूरी तरह हताश,
कभी आगे बढ़ जाने की
पलकों पर बाले हुए आस
कभी खुद से भागता सा
कभी साँसों की लम्बाई
बिलान्दो से नापता सा
मैं

तुमसे बिछड़कर यूँ
मिला करती है अब
मुझसे हर रोज़ ज़िन्दगी

Tuesday, September 3, 2013

नाराजगी


जो भी करते हो गर तुम ही करते हो
अच्छा बुरा है जो सब तुम रचते हो
तो उत्तर दो हे इश्वर मैं किताबों से दूर क्यूँ हूँ
अपने जायज़ सपने भी पाने में मजबूर क्यूँ हूँ

गर नहीं तुम्हारी कुव्वत थी
मुझे रोटी कपड़ा देने की
क्यूँ सोचा फिर तुमने
बच्चे को दुनिया में भेज दूं
तुमने छीना बचपन मेरा
मैं इतना गुस्सा हूँ तुमसे
सोच रहा हूँ बीच चौराहे
तुमको औने पौने में बेच दूं

खामोशियाँ

न उसने कुछ कहा न मैंने ही कुछ कहा
बस तैरती रही एक खामोशी दरमियाँ
न मालूम कि कर पायी तर्जुमा
किस हद तक वो मेरी खामोशी का
ना मालूम समझ पाया कितना
मैं उसकी खामोशी के मानी
बस इतना ही समझ पाए दोनों
कि ये वक़्त-ए-जुदाई है
मुस्कुराके गले मिले
हम एक दुसरे से
और उम्र भर को जुदा हो गए

Sunday, September 1, 2013


मेरे अनुत्तरित प्रश्नों से रंगा मेरा मन दर्पण
तुम्हारा दीर्घ मौन, मौन की तीखी चुभन
और हमारा रिश्ता

सपनों के अम्बर पर मेरा मन हिरन
बंदिशों, दायरों का घर तुम्हारा जीवन
और हमारा रिश्ता

मेरे मन में कुलांचे भरते आवारगी,फ़कीरपन
बांहों में समेटने को दुनिया,आतुर तुम्हारा मन
और हमारा रिश्ता

अभावों के मंच पर, मेरी संतुष्टि के गीत की सरगम
“और कुछ” की चाह में तुम्हारे दामन का ये खालीपन
और हमारा रिश्ता

तुम्हे पाने के एवज़ में मेरा इश्वर को नमन वंदन
मुस्कुराहटें दरकिनार करके हर पल तुम्हारा क्रन्दन
और हमारा रिश्ता

प्रेम के पथ पर अपना सर्वस्व लुटाता एक जीवन
खोने पाने के गणित में उलझा एक व्यापारीपन
और हमारा रिश्ता

संग चलने की ख्वाहिशें, ना मिल पाने का बंधन
दो किनारों से फासले मगर दरिया सा सांझापन
और हमारा रिश्ता

Sunday, August 25, 2013

दुकानें


राजभवन में राम के हुआ अचानक हल्ला
सावधान ए वीरो हो सकता है राम पे हमला
क्रोध में भरकर बोले लक्ष्मण जो भ्राता पर कुद्रष्टि डालेगा
है शपथ राम की ये दास राम का,उसका नाम मिटा डालेगा
मंद मंद मुस्काकर बोले भगवन अनुज शांत हो जाओ तुम
गौर से सारे खेल को समझो और सबको समझाओ तुम

हाथों में जो फूल लिए है मुझको अर्पित करने आया है
और उसके रस्ते में जिसने साइकिल का जाल बिछाया है
अपने अपने खेल के देखो, दोनों मंझे खिलाड़ी हैं
दोनों एक दूजे के पूरक हैं, दोनों पक्के वाले याड़ी हैं
हाथ ये हर पल सोच रहा है कैसे फिर खेल का हिस्सा हो जाऊं मैं
हाथी भी है घात लगाये, किसको कुचलूँ किसको सर पे बिठाऊं मैं

निश्चिन्त रहो हे लक्ष्मण बिलकुल नहीं तुम्हारा राम खतरे में
वो भी खुदा को बेच रहे हैं, जो चीख रहे कि है इस्लाम खतरे में
बस उलझा दिया है आम आदमी , विकास का ताकी ज़िक्र न हो
पड़ जाएगी वर्ना इन सबकी आपनी अपनी दुकान खतरे में

लक्ष्मण क्या मुझे सुरक्षा देगा कोई,क्या मुझे हानी पहुंचाएगा
जिस दिन हल्का सा भी चाह लूँगा सब मिटटी में मिल जायेगा

Friday, August 23, 2013

गुलज़ार साब के लिए

ना मालूम हिमाक़त है कि हिम्मत है
यूँ दस्तक देना सूरज के दरवाज़े पर
मुझ अधजले से दीपक की

मैं ये सोच कर आपके सजदे में हूँ
आप मुस्कुरा जो दिए तो संवर जाऊंगा
गर न हो सकी हासिल मुझको
नज़र-ए-करम आपकी
तब भी उम्र भर
मैं अपने हौसले पे मुस्कुराऊंगा

शिकवा

मैं तेरी ही सूरत तलाशता हूँ 
खंडहर से भी मंदिर में
मैं सज्दा करके ही बढ़ता हूँ आगे 

बंद मस्जिद को भी तेरी
तू गुज़र पाता है कैसे 

ए खुदा
मेरे ज़िंदा ख़्वाबों की आँखें मीचकर