कदमों के वो तमाम निशान,
जो लिख्खे थे हमने तुमने,
दिल्ली की सड़कों पर,
सुना है वक्त ने लगा के झाड़ू,
वो कूड़ेदान में फ़ेंक दिए है ,
उन रस्तों पर कुछ नए कदम,
लिखते है अब अपने सफर,
बिलकुल वैसे ही,
जैसे हम तुम लिखते थे,
इक दूजे का हाथ पकड़कर
वो रहगुज़र, वो दरख़्त,वो हवाएं,
सब भूल गए है हमको,
पर तुम को तो याद है न विन्नी,
वो राह
जहाँ हम पहली बार मिले थे,
वो दरख़्त
जो हमारी कसमों का गवाह था
वो हवाएं
जिनके पंखों पर हमने उड़ना सीखा था
तुम्हे याद है न विन्नी.......
मुझे याद है रवि और हमेशा वो वक्त याद रहेगा जो मैंने और तुमने साथ-साथ गुज़ारा|
ReplyDeleteबहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में तुमने यादों को को शब्दों में पिरोया है