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Welcome to my blog LAMHE
दिल ने जिस लम्हा जो महसूस किया है मैंने उस अहसास को अल्फ़ाज़ में पिरोने की कोशिश की है|
और ऐसे ही अहसासात और लम्हात का इक गाँव बसाया है जिसे मैंने नाम दिया है "लम्हे"
आपसे उम्मीद है कि मेरी ख़ामियों के लिए आप मुझे मुआफ़ करेंगे.
आपसे एक इल्तजा और कि ये लम्हे मेरा ख़ज़ाना है इन्हें यहाँ से कॉपी करके sms या Email न करें|
लम्हे तक आने के लिए शुक्रिया
रवि





Wednesday, February 24, 2010

तन्हाई










इसी दहशत में अब रात गुज़रती है,

कल होगी सुबह फिर से,

    उलझी उलझी सी सुबह

दहलीज़ पे बैठी है,

इक उम्र सा दिन ये 

आखिर गुजरेगा कैसे,

हर शाम झोंक कर मुझको

तपती रात की भट्टी में,

होती है विदा शर्मिंदा सी,

    क्या थी क्या हो गयी है 
    ज़िन्दगी
    ऐ बेवफा इक तेरे बिन ...... 

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