इसी दहशत में अब रात गुज़रती है,
कल होगी सुबह फिर से,
उलझी उलझी सी सुबह,
दहलीज़ पे बैठी है,
इक उम्र सा दिन ये
आखिर गुजरेगा कैसे,
हर शाम झोंक कर मुझको,
तपती रात की भट्टी में,
होती है विदा शर्मिंदा सी,
क्या थी क्या हो गयी है
ज़िन्दगी
ऐ बेवफा इक तेरे बिन ......
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